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​बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला: जंगली तोते भी ‘वन्यजीव’, फसल नुकसान पर सरकार देगी मुआवजा

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल महाराष्ट्र के किसानों के लिए, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और मानवीय अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वन्यजीवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अगर नागरिकों की है, तो उनसे होने वाले नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी सरकार की है।

​बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला: जंगली तोते भी ‘वन्यजीव’, फसल नुकसान पर सरकार देगी मुआवजा

​अदालत ने समानता के अधिकार और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों को आधार बनाकर किसान के पक्ष में निर्णय सुनाया है।

​1. मामला क्या था?

​पीड़ित किसान: वर्धा जिले के हिंगी गांव के 70 वर्षीय महादेव डेकाटे।

​घटना: मई 2026 में पास के वन्यजीव अभयारण्य से आए जंगली तोतों ने किसान के अनार के बगीचे को तहस-नहस कर दिया।

​नुकसान: किसान के अनुसार उनके 200 पेड़ प्रभावित हुए और कुल आर्थिक नुकसान लगभग 20 लाख रुपये का हुआ। कृषि विभाग के निरीक्षण में भी 50% फल खराब होने की पुष्टि हुई थी।

​2. सरकार की दलील और कोर्ट का रुख

​सरकार का तर्क: प्रशासन का कहना था कि मौजूदा नियमों के तहत केवल बड़े जानवरों (जैसे हाथी या बाइसन) द्वारा किए गए नुकसान पर ही मुआवजा दिया जा सकता है।

​कोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल कुछ जानवरों को चुनना और दूसरों को छोड़ देना संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) का उल्लंघन है।

​3. फैसले के प्रमुख कानूनी आधार

​अदालत ने अपने आदेश में दो बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं:

​राज्य की संपत्ति: ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972’ के तहत तोते संरक्षित प्रजाति हैं। चूंकि ये कानूनन संरक्षित हैं, इसलिए इन्हें ‘राज्य की संपत्ति’ माना जाता है। अपनी संपत्ति से होने वाले किसी भी नुकसान के लिए राज्य जवाबदेह है।

​वन्यजीवों की सुरक्षा बनाम किसान का हित: कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि सरकार नुकसान की भरपाई नहीं करेगी, तो किसान अपनी फसल बचाने के लिए वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाने वाले कदम उठा सकते हैं। इससे वन्यजीव संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।

​4. कोर्ट का आदेश

​मुआवजा: अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि वह किसान महादेव डेकाटे को प्रति पेड़ 200 रुपये के हिसाब से फिलहाल 40,000 रुपये का भुगतान करे।

​भविष्य का संकेत: यह फैसला एक मिसाल बनेगा, जिससे भविष्य में पक्षियों और अन्य छोटे वन्यजीवों द्वारा किए गए फसल नुकसान पर भी किसान मुआवजे का दावा कर सकेंगे।

​निष्कर्ष: बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला “सह-अस्तित्व” (Co-existence) की भावना को मजबूत करता है। यह संदेश देता है कि पर्यावरण और वन्यजीवों को बचाने की कीमत केवल गरीब किसान को नहीं चुकानी चाहिए, बल्कि इसमें सरकार की भी बराबर की भागीदारी होनी चाहिए।

​क्या आपको लगता है कि इस फैसले के बाद सरकार को मुआवजे की अपनी नियमावली (List of animals) को पूरी तरह से अपडेट करने की जरूरत है?

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