‘शंकराचार्य कौन है, यह ब्यूरोक्रेसी तय नहीं करेगी’: उमा भारती ने योगी सरकार को घेरा, माघ मेले विवाद पर तीखा हमला
‘शंकराचार्य कौन है, यह ब्यूरोक्रेसी तय नहीं करेगी’: उमा भारती ने योगी सरकार को घेरा, माघ मेले विवाद पर तीखा हमला
वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से उनके पद की वैधता (शंकराचार्य होने का सबूत) मांगने पर उमा भारती ने कहा कि “शंकराचार्य कौन है, यह ब्यूरोक्रेसी तय नहीं करेगी”। उन्होंने इसे प्रशासनिक मर्यादाओं और अधिकारों का उल्लंघन बताया और कहा कि ऐसा फैसला सिर्फ शंकराचार्यों की परिषद या विद्वत समाज ले सकता है।
क्या है पूरा विवाद?
माघ मेला 2026 के दौरान प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके शिविर बोर्ड पर “शंकराचार्य” लिखने से रोका और सबूत मांगे। प्रशासन का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश (ज्योतिष पीठ के पट्टाभिषेक को लेकर) के आधार पर उन्हें आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसका विरोध किया, कहा कि यह अपमान है और वे आश्रम में नहीं जाएंगे, बल्कि फुटपाथ पर रहेंगे।
उमा भारती ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लिखा:
“मुझे विश्वास है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज एवं उत्तर प्रदेश सरकार के बीच कोई सकारात्मक समाधान निकल आएगा, किंतु प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा शंकराचार्य होने का सबूत मांगना, यह प्रशासन ने अपनी मर्यादाओं एवं अधिकारों का उल्लंघन किया है। यह अधिकार तो सिर्फ शंकराचार्यों का एवं विद्वत परिषद का है।”
उमा भारती का बयान क्यों महत्वपूर्ण?
यह भाजपा के अंदर से ही सरकार पर पहला बड़ा हमला है, खासकर जब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने UGC नियमों और इसी शंकराचार्य विवाद (उनके शिष्यों की कथित मारपीट) पर इस्तीफा दिया था।
उमा भारती ने स्पष्ट किया कि उनका बयान योगी आदित्यनाथ के खिलाफ नहीं है, बल्कि प्रशासन की “अति” पर है। उन्होंने कहा कि योगी विरोधी “खुशफहमी” न पालें।
यह विवाद अब धार्मिक-राजनीतिक बन गया है। कई संतों (जैसे परमहंस महाराज) ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर NSA लगाने की मांग की, जबकि कुछ ने उनका समर्थन किया।
प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया
अभी तक योगी सरकार या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है। मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है। विवाद के कारण माघ मेले की तैयारियां प्रभावित हो रही हैं, और सवर्ण समाज के प्रदर्शन (UGC नियमों के साथ जुड़कर) और तेज हो गए हैं।
यह घटना UP में धार्मिक संस्थानों पर राज्य की भूमिका पर नई बहस छेड़ रही है। उमा भारती का बयान दिखाता है कि भाजपा के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद हैं। स्थिति पर सभी की नजरें टिकी हैं – क्या सकारात्मक समाधान निकलेगा या विवाद और बढ़ेगा?
