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होर्मुज की घेराबंदी और परमाणु कार्यक्रम: US-ईरान क्यों अड़े हुए? कूटनीति की जंग तेज

होर्मुज की घेराबंदी और परमाणु कार्यक्रम: US-ईरान क्यों अड़े हुए? कूटनीति की जंग तेज

नई दिल्ली, 28 अप्रैल 2026: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Hormuz Strait) पर जारी दोतरफा घेराबंदी और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका-ईरान के बीच तनाव चरम पर है। फरवरी 2026 में अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद शुरू हुई इस जंग अब आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर केंद्रित हो गई है। ईरान ने हाल ही में प्रस्ताव दिया है कि अगर अमेरिका अपना नौसैनिक ब्लॉकेड हटा ले और युद्ध समाप्त कर दे तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल सकता है, लेकिन परमाणु मुद्दे पर बातचीत को बाद में रखने की शर्त रखी है।

विश्लेषकों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के तेल व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है, जहां से दुनिया का लगभग 20-25 प्रतिशत तेल और LNG गुजरता है। ईरान ने फरवरी के हमलों के जवाब में इस जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था, जबकि अमेरिका ने अप्रैल से ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले जहाजों पर ब्लॉकेड लगा दिया। इस ‘ड्यूल ब्लॉकेड’ के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो रहा है और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।

दोनों पक्षों की अड़ी हुई शर्तें

ईरान का पक्ष:

ईरान का कहना है कि अमेरिका पहले अपना ब्लॉकेड हटाए और युद्ध समाप्त करे। उसके बाद ही परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा हो सकती है। तेहरान होर्मुज को नियंत्रित रखने को अपनी रणनीतिक ताकत मानता है और इसे ‘आर्थिक परमाणु हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ईरान ने कुछ ‘गैर-शत्रुतापूर्ण’ देशों (जैसे चीन, पाकिस्तान) के जहाजों को छूट दी है, लेकिन कुल मिलाकर शिपिंग लगभग ठप है।

अमेरिका का पक्ष:

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम स्पष्ट रूप से कह चुकी है कि कोई भी समझौता बिना ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सख्त और स्थायी प्रतिबंध के संभव नहीं है। अमेरिका ‘जीरो एनरिचमेंट’ (ईरान में कोई यूरेनियम संवर्धन नहीं) की मांग पर अड़ा हुआ है। ईरान के पास वर्तमान में 60% शुद्धता वाला लगभग 440 किलोग्राम यूरेनियम है, जो हथियार-ग्रेड बनाने के लिए काफी करीब माना जा रहा है। ट्रंप प्रशासन परमाणु मुद्दे को पहले हल करने पर जोर दे रहा है, जबकि होर्मुज को बिना शर्त खोलने की मांग कर रहा है।

विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि ईरान का प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इसका मतलब होगा कि ईरान होर्मुज पर टोल वसूले और नियंत्रण रखे।

पृष्ठभूमि: युद्ध से लेकर कूटनीति तक

28 फरवरी 2026: अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर बड़े हमले शुरू किए, जिसमें परमाणु साइट्स, मिसाइल कार्यक्रम और कमांड सेंटर निशाना बने। सुप्रीम लीडर अली खामenei की मौत की खबर भी आई।

ईरान ने जवाबी हमले किए और होर्मुज बंद कर दिया।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका।

अप्रैल 2026 से अमेरिकी नौसेना ने ईरानी बंदरगाहों पर ब्लॉकेड लगा दिया।

वर्तमान में एक नाजुक ceasefire लागू है, लेकिन दोनों तरफ से धमकियां जारी हैं। ईरान कह रहा है कि ब्लॉकेड हटाए बिना आगे बातचीत मुश्किल है, जबकि अमेरिका कह रहा है कि परमाणु खतरे को खत्म किए बिना होर्मुज खुलना नामुमकिन है।

वैश्विक प्रभाव

इस जंग का असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। यूरोप और एशिया के कई देश तेल आपूर्ति को लेकर चिंतित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह गतिरोध लंबा चला तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ जाएगा।

कूटनीति की राह:

पाकिस्तान, चीन और ओमान जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दोनों पक्ष अपनी रणनीतिक ‘रेड लाइन’ पर अड़े हुए हैं — अमेरिका परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म करना चाहता है, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना चाहता है।

यह टकराव न सिर्फ होर्मुज की घेराबंदी, बल्कि मध्य पूर्व की भविष्य की सुरक्षा और विश्व ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा परीक्षण बन गया है। आगे की बातचीत से ही स्पष्ट होगा कि दोनों देश समझौते की राह निकाल पाते हैं या तनाव और बढ़ता है।

(जांच और कूटनीतिक प्रयास अभी जारी हैं। स्थिति तेजी से बदल रही है।)

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