कर्नाटक में संवैधानिक संकट: राज्यपाल ने सदन में सिर्फ दो लाइनें पढ़ीं, वॉकआउट कर दिया—कौन लांघ रहा है सीमाएं?
कर्नाटक में संवैधानिक संकट: राज्यपाल ने सदन में सिर्फ दो लाइनें पढ़ीं, वॉकआउट कर दिया—कौन लांघ रहा है सीमाएं?
कर्नाटक विधानमंडल के संयुक्त सत्र में आज एक बड़ा संवैधानिक विवाद सामने आया, जब राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण की केवल दो पंक्तियां पढ़ीं और बीच में ही सदन से वॉकआउट कर गए। यह घटना दक्षिण भारत में राज्यपालों और गैर-बीजेपी सरकारों के बीच बढ़ते टकराव की नई कड़ी है, जहां तमिलनाडु और केरल के बाद अब कर्नाटक भी इस चक्रव्यूह में फंस गया है।
सूत्रों के अनुसार, विवाद की जड़ सरकार के मसौदे में शामिल 11 पैराग्राफ थे, जिनमें केंद्र सरकार की नीतियों—खासकर MGNREGA (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) में प्रस्तावित बदलावों (VB-G RAM G बिल के संदर्भ में), टैक्स डेवोल्यूशन में कथित भेदभाव और फंड आवंटन की कमी—की आलोचना की गई थी। राज्यपाल ने इन हिस्सों को ‘सरकारी प्रोपगैंडा’ और ‘राजनीतिक’ करार देते हुए पढ़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने अभिभाषण की शुरुआत की और सिर्फ “जय हिंद, जय कर्नाटक” तक पढ़कर सदन छोड़ दिया।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की तीखी प्रतिक्रिया
सीएम सिद्धारमैया ने इसे “संविधान का घोर उल्लंघन” बताया और आरोप लगाया कि राज्यपाल केंद्र सरकार की “कठपुतली” की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “अनुच्छेद 176 और 163 के तहत राज्यपाल को मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत अभिभाषण पढ़ना अनिवार्य है। यह सदन का अपमान है और लोकतंत्र के खिलाफ कदम है।” सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है, जहां इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशानिर्देश मांगे जाएंगे।
कानून मंत्री एच.के. पाटिल ने इसे “लोकतंत्र के लिए काला दिन” करार दिया, जबकि मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार ए.एस. पोन्नन्ना ने बताया कि सरकार पहले से ही सुप्रीम कोर्ट जाने की रणनीति तैयार रखे हुए थी।
राजभवन का पक्ष
राज्यपाल के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि अभिभाषण में शामिल कुछ हिस्से तथ्यात्मक रूप से गलत थे और राजनीतिक रंग लिए हुए थे। राज्यपाल ने संवैधानिक पद की गरिमा बनाए रखने और निष्पक्षता के लिए ऐसा कदम उठाया। एक दिन पहले भी गहलोत ने 11 पैराग्राफ हटाने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने केवल मामूली संशोधन पर सहमति जताई, जिससे गतिरोध बढ़ गया।
क्या कहता है संविधान?
संविधान के अनुच्छेद 176 के अनुसार, राज्यपाल को प्रत्येक नए सत्र की शुरुआत में विधानमंडल को संबोधित करना होता है, और यह अभिभाषण मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया जाता है। राज्यपाल सामान्यतः इसे ‘रबर स्टांप’ की तरह पढ़ते हैं, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभिभाषण में स्पष्ट रूप से असंवैधानिक या गैर-तथ्यात्मक बातें हों, तो राज्यपाल अपनी असहमति जता सकता है। हालांकि, वॉकआउट जैसा कदम असामान्य और विवादास्पद है।
विपक्षी बीजेपी ने सरकार पर हमला बोला और कहा कि सिद्धारमैया सरकार केंद्र विरोधी राजनीति के चक्कर में संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है।
यह घटना दक्षिणी राज्यों में राज्यपाल-सरकार टकराव को और तेज कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करता है, तो यह पूरे देश के लिए राज्यपालों की भूमिका पर नया दिशानिर्देश तय कर सकता है। फिलहाल, कर्नाटक में राजनीतिक तापमान चरम पर है—और सवाल यह है कि असली ‘रबर स्टांप’ कौन है, और सीमाएं किसने लांघीं?
