राजनीति

कर्नाटक सरकार पर भड़का विवाद: नेशनल हेराल्ड को सबसे ज्यादा विज्ञापन फंड, राज्य में सर्कुलेशन ‘जीरो’ होने के बावजूद

कर्नाटक सरकार पर भड़का विवाद: नेशनल हेराल्ड को सबसे ज्यादा विज्ञापन फंड, राज्य में सर्कुलेशन ‘जीरो’ होने के बावजूद

बेंगलुरु, 8 जनवरी 2026: कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार एक बार फिर विवादों में घिर गई है। सरकारी विज्ञापन बजट में कांग्रेस से जुड़े नेशनल हेराल्ड अखबार को सबसे ज्यादा फंड दिए जाने का खुलासा हुआ है, जबकि कर्नाटक में इस अखबार का सर्कुलेशन लगभग शून्य है। बीजेपी ने इसे ‘खुली लूट’ और टैक्सपेयर्स के पैसे का दुरुपयोग करार दिया है, जबकि कांग्रेस ने इसका बचाव करते हुए नेशनल हेराल्ड को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ बताया है।

सीएनएन-न्यूज18 और आज तक जैसे मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकारी दस्तावेजों से पता चला है कि लगातार दो वित्तीय वर्षों में नेशनल हेराल्ड राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में विज्ञापनों का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा।

2023-24 में: नेशनल हेराल्ड को 1.90 करोड़ रुपये।

2024-25 में: करीब 99 लाख रुपये (राष्ट्रीय अखबारों पर कुल खर्च 1.42 करोड़ में से 69% हिस्सा)।

इस दौरान कई बड़े और ज्यादा सर्कुलेशन वाले राष्ट्रीय अखबारों को या तो बहुत कम राशि मिली या कुछ को कुछ भी नहीं। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कर्नाटक में नेशनल हेराल्ड की पाठक संख्या नगण्य है और राज्य में इसका कोई सर्कुलेशन फुटप्रिंट नहीं है। यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी पहुंच सीमित है, मुख्य रूप से दिल्ली तक।

बीजेपी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. सीएन अश्वथ नारायण ने इसे ‘टैक्सपेयर्स की खुली लूट’ बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जांच के दायरे में आए नेशनल हेराल्ड को सरकारी फंड क्यों दिए जा रहे हैं? “कर्नाटक या कहीं और सर्कुलेशन न होने वाले अखबार में विज्ञापन देने का क्या औचित्य? यह राजनीतिक पक्षपात है।”

कांग्रेस का पक्ष: राज्य के मंत्री ईश्वर खंड्रे ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, “नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन देने में कुछ गलत नहीं। यह राष्ट्रीय धरोहर है। सवाल उठाना राष्ट्र-विरोधी मानसिकता दिखाता है।”

यह विवाद ऐसे समय में आया है जब नेशनल हेराल्ड पहले से ही ईडी जांच के घेरे में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा कर्नाटक की राजनीति में नई आग भड़का सकता है, खासकर जब राज्य में कांग्रेस की गारंटी योजनाओं का प्रचार जोरों पर है। बीजेपी इसे भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाकर हमलावर हो गई है।

क्या यह सिर्फ विज्ञापन नीति का मामला है या राजनीतिक पक्षपात? जनता के पैसे के इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में इस पर और बहस होने की संभावना है।

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