देहरादून राजभवन का नया नाम ‘लोक भवन’: राज्यपाल गुरमीत सिंह ने कहा- ‘लोक ही राष्ट्र की शक्ति, लोकतंत्र की आत्मा’
देहरादून राजभवन का नया नाम ‘लोक भवन’: राज्यपाल गुरमीत सिंह ने कहा- ‘लोक ही राष्ट्र की शक्ति, लोकतंत्र की आत्मा’
देहरादून। उत्तराखंड के राजभवन को आधिकारिक रूप से ‘लोक भवन’ नाम दिया गया है। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से.नि.) की स्वीकृति के बाद बुधवार (3 दिसंबर 2025) को राजभवन के मुख्य द्वार पर ‘लोक भवन’ नाम अंकित कर दिया गया। यह बदलाव केंद्र सरकार की सहमति और गृह मंत्रालय के 25 नवंबर के पत्र के आधार पर हुआ, जिसकी अधिसूचना राज्यपाल सचिव रविनाथ रमन ने जारी की। अब ‘राजभवन उत्तराखंड’ की जगह ‘लोक भवन उत्तराखंड’ आधिकारिक नाम हो गया है। इसी कड़ी में नैनीताल राजभवन का नाम भी बदलकर ‘लोक भवन’ किया जाएगा, जो ब्रिटिश काल की ‘समर कैपिटल’ परंपरा को समाप्त करने का प्रतीक बनेगा।
राज्यपाल गुरमीत सिंह ने नाम परिवर्तन समारोह के दौरान कहा, “संविधान में ‘लोक’ यानी ‘जनता’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। लोक ही राष्ट्र की शक्ति है, लोक ही लोकतंत्र की आत्मा है।” उन्होंने आशा व्यक्त की कि लोक भवन उत्तराखंड के नागरिकों के लिए आशा, संवेदनशीलता, पारदर्शिता और जनसेवा का केंद्र बनेगा। राज्यपाल ने जोर देकर कहा, “लोक भवन जनता की सेवा की उस पवित्र भावना का प्रतीक है, जिसमें हर नागरिक इस भवन का अपना हिस्सा महसूस करें। यह भवन केवल प्रशासनिक प्रतिष्ठान का प्रतीक नहीं, बल्कि उत्तराखंड के हर व्यक्ति की आकांक्षाओं, उम्मीदों और विश्वास का घर है। हमारा संकल्प है कि लोक भवन सचमुच ‘लोक’ के लिए, ‘लोक’ के साथ और ‘लोक’ के समर्पण में कार्य करेगा।”
यह कदम राज्य सरकार के जनकल्याण केंद्रित शासन की भावना को मजबूत करने की दिशा में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे “प्रशासन को अधिक लोकतांत्रिक स्वरूप देने का प्रयास” बताया। राज्यपाल ने कहा कि यह बदलाव उत्तराखंड के मूल्यों—सादगी, सेवा और समावेश—को प्रतिबिंबित करता है। अब लोक भवन में होने वाली बैठकों, निर्णयों और कार्यक्रमों को जनता से जोड़ने पर जोर दिया जाएगा।
नैनीताल राजभवन का ऐतिहासिक महत्व
नैनीताल राजभवन ब्रिटिश काल की ‘समर कैपिटल’ परंपरा का प्रतीक था। 1900 के दशक की शुरुआत में गर्मियों में कुमाऊं कमिश्नर और उच्च अधिकारी यहां ठहरते थे। यह अंग्रेजी प्रशासन की ग्रीष्मकालीन सत्ता स्थली बन गया। 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद यह राज्यपाल का आधिकारिक ग्रीष्मकालीन आवास बना। यहां प्रदेश के कई महत्वपूर्ण निर्णय, बैठकें और विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी होती रही। नाम परिवर्तन से इस औपनिवेशिक विरासत को समाप्त कर इसे जन-केंद्रित बनाने का संकल्प लिया गया है।
राज्य सरकार के अनुसार, यह बदलाव पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण को भी बढ़ावा देगा। लोक भवन में अब जनसुनवाई, सांस्कृतिक आयोजन और युवा कार्यक्रमों को प्राथमिकता मिलेगी। विपक्षी दलों ने इसे सकारात्मक बताया, लेकिन मांग की कि नाम बदलाव के साथ बजट में जनसेवा योजनाओं को मजबूत किया जाए। राज्यपाल ने अंत में कहा, “लोक भवन हर उत्तराखंडवासी का घर बनेगा, जहां उनकी आवाज सुनी जाएगी।”
यह कदम उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ से आगे ‘लोकभूमि’ बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। क्या यह परिवर्तन प्रशासन को और पारदर्शी बनाएगा? आने वाले समय में असर दिखेगा।
