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सुप्रीम कोर्ट ने CAA के तहत उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को SIR में शामिल करने पर ECI-केंद्र को नोटिस: ‘भेदभाव नहीं, डीम्ड सिटिजनशिप लागू हो’

सुप्रीम कोर्ट ने CAA के तहत उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को SIR में शामिल करने पर ECI-केंद्र को नोटिस: ‘भेदभाव नहीं, डीम्ड सिटिजनशिप लागू हो’

सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसी समुदायों को विशेष समावेशन रजिस्टर (SIR) में अस्थायी रूप से शामिल करने की मांग पर चुनाव आयोग (ECI), केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया है। NGO ‘आत्मदीप’ की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस ज्योमल्या बागची की बेंच ने सोमवार को यह आदेश दिया। याचिका में आरोप है कि इन प्रवासियों ने 2014 से पहले नागरिकता के लिए आवेदन किया था, लेकिन अब तक कोई प्रगति नहीं हुई। CAA के तहत ये अल्पसंख्यक भारतीय नागरिकता के हकदार हैं, फिर भी SIR के दौरान उनका मताधिकार खतरे में है।

याचिकाकर्ता NGO आत्मदीप ने तर्क दिया कि बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न से भागे ये प्रवासी 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत पहुंचे थे। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के अनुसार, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों को पासपोर्ट (एंट्री इन इंडिया) एक्ट 1920 या फॉरेनर्स एक्ट 1946 के तहत छूट मिलती है। पश्चिम बंगाल में हजारों ऐसे प्रवासियों के नाम 2025 की वोटर लिस्ट में हैं, लेकिन SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के दौरान वे वोट न दे पाएं, इसलिए अस्थायी वोटर पंजीकरण का प्रावधान हो। NGO ने कहा कि केंद्र की नागरिकता प्रक्रिया में देरी से ये लोग वंचित हो रहे हैं, जबकि वे सालों से भारत में रह रहे हैं। कोर्ट से मांग की गई कि नागरिकता पूरी होने तक इनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत की अहम टिप्पणी ने मामले को नई दिशा दी। उन्होंने कहा, “हम सिर्फ इसलिए भेदभाव नहीं कर सकते कि कोई जैन है या बौद्ध। डीम्ड सिटिजनशिप (मान ली गई नागरिकता) की अवधारणा लागू करनी होगी। अधिकार तो हैं, लेकिन हर केस तथ्यों पर परखा जाएगा।” CJI ने जोर दिया कि CAA का उद्देश्य उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को न्याय देना है, न कि जाति-धर्म के आधार पर विभेद। बेंच ने अधिकारियों से 2 हफ्ते में जवाब मांगा है।

यह मामला SIR के व्यापक विवाद से जुड़ा है, जहां तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में विपक्ष ने इसे ‘डी फैक्टो NRC’ बताकर चुनौती दी है। ECI का कहना है कि केंद्र की नागरिकता जांच सीमित है, लेकिन विपक्ष इसे ‘लोकतंत्र पर हमला’ बता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का हस्तक्षेप CAA को लागू करने में तेजी ला सकता है। पश्चिम बंगाल में बांग्ला सीमा पर ऐसे हजारों प्रवासी हैं, जिनकी जिंदगी इस फैसले पर टिकी है। क्या कोर्ट डीम्ड सिटिजनशिप का रास्ता साफ करेगा? अगली सुनवाई पर नजरें टिकी हैं।

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