यूपी में SIR की डेडलाइन बढ़ाने की मांग: अखिलेश का तीर बिहार हार पर, भाजपा पर ‘वोट चोरी’ का आरोप
यूपी में SIR की डेडलाइन बढ़ाने की मांग: अखिलेश का तीर बिहार हार पर, भाजपा पर ‘वोट चोरी’ का आरोप
उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर सियासी बवाल तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग से SIR की समय सीमा बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह अभियान नवंबर-दिसंबर में चल रहा है, जब शादियों का सीजन चरम पर होता है। “SIR से हमें कोई एतराज नहीं, लेकिन डेडलाइन बढ़ाई जानी चाहिए ताकि लोग अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकें,” अखिलेश ने एक सभा में कहा। यह मांग बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की हार से उपजी है, जहां विपक्षी महागठबंधन को SIR के कारण भारी नुकसान हुआ।
अखिलेश ने SIR को “चुनावी साजिश” करार देते हुए भाजपा पर वोटर लिस्ट से नाम काटने का आरोप लगाया। “बिहार में भाजपा ने SIR का खेल खेला, जहां आरजेडी जैसी पार्टियां उन सीटों पर हार गईं जहां सबसे ज्यादा वोट SIR में कटे थे। यूपी में हम इसे दोहराने नहीं देंगे,” उन्होंने कहा। सपा प्रमुख ने सभी विपक्षी दलों से एकजुट होकर मतदाता सूची को मजबूत बनाने का आह्वान किया। “हमारा प्रयास है कि पारदर्शी वोटर लिस्ट बने, लेकिन भाजपा को खेलना आता है। बिहार जैसा घोटाला यूपी, पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु में नहीं चलेगा,” अखिलेश ने एक्स पर पोस्ट करते हुए ‘PDA सेंटिनल’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की निगरानी का जिक्र किया।
SIR अभियान 4 नवंबर से शुरू होकर 9 दिसंबर तक ड्राफ्ट लिस्ट जारी करने का लक्ष्य रखता है, जबकि आपत्तियां 8 जनवरी 2026 तक दर्ज की जा सकती हैं। अखिलेश ने पहले ही 31 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में SIR फॉर्म में जाति कॉलम जोड़ने की मांग की थी, इसे “प्रारंभिक जाति जनगणना” बताते हुए। उन्होंने कहा कि इससे पिछड़े वर्गों के लिए योजनाएं बेहतर होंगी। सपा ने ‘SIR PDA प्रहरी’ यूनिट गठित की है, जो BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) की निगरानी करेगी। अखिलेश ने आरोप लगाया कि BLO में PDA वर्ग के प्रतिनिधि शून्य हैं, जो निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
भाजपा ने अखिलेश के बयानों को “जातिवादी” बताकर खारिज किया। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा, “SIR पारदर्शिता का प्रतीक है, सपा घुसपैठिए वोटरों पर निर्भर है। अखिलेश को माफी मांगनी चाहिए।” उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने तंज कसा, “अखिलेश ने राहुल गांधी से सीखा नहीं, बिहार हार से सबक लें।” कांग्रेस ने भी SIR पर सवाल उठाए, जिलाधिकारियों के ट्रांसफर को ECI दिशानिर्देशों का उल्लंघन बताते हुए रद्द करने की मांग की।
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद 2027 यूपी विधानसभा चुनावों की जमीन तैयार कर रहा है। सपा का फोकस वोटर नामांकन और नाम कटौती रोकने पर है, जबकि भाजपा इसे “विकास विरोधी” बता रही। अखिलेश की रणनीति बिहार हार से प्रेरित लगती है, जहां RJD को 10-15% वोटर डिलीशन का सामना करना पड़ा। यदि SIR में बड़े पैमाने पर नाम कटते हैं, तो विपक्ष सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। फिलहाल, यूपी की सियासत में SIR अब “सामाजिक न्याय” का हथियार बन चुका है। क्या यह विपक्ष को एकजुट करेगा या भाजपा का पलड़ा भारी रहेगा? नजरें 2026 की अंतिम डेडलाइन पर हैं।
