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ओडिशा: सिस्टम की हार, भाई के संघर्ष की जीत; बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचे जीतू को घर आकर मिली हक की राशि

ओडिशा: सिस्टम की हार, भाई के संघर्ष की जीत; बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचे जीतू को घर आकर मिली हक की राशि

​विशेष संवाददाता, क्योंझर (ओडिशा) जिस सिस्टम की बेरुखी ने एक भाई को अपनी बहन की हड्डियों का कंकाल बोरी में भरकर बैंक की चौखट तक जाने पर मजबूर कर दिया था, वही सिस्टम आज खुद चलकर उस गरीब की झोपड़ी तक पहुंचा। क्योंझर जिले के दियानाली गांव में आज एक बेहद भावुक दृश्य देखने को मिला, जब प्रशासन और बैंक अधिकारियों ने जीतू मुंडा के घर जाकर उसे उसकी दिवंगत बहन की जमा पूंजी सौंपी।

​बोरी में कंकाल और व्यवस्था पर सवाल

​कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। दियानाली निवासी जीतू मुंडा अपनी मृत बहन कालरा मुंडा के खाते में जमा पैसे निकालने के लिए बैंक के चक्कर काट-काटकर हार चुका था। अनपढ़ होने और कागजी दांव-पेच न समझ पाने के कारण जब उसे बार-बार खाली हाथ लौटाया गया, तो वह गुस्से और बेबसी में अपनी बहन के अवशेष (कंकाल) लेकर बैंक पहुंच गया। इस खौफनाक मंजर ने बैंकिंग सिस्टम और प्रशासनिक संवेदनशीलता की कलई खोलकर रख दी थी।

​CCTV फुटेज और सिस्टम की ‘जागृति’

​वीडियो वायरल होने के बाद जब उच्च अधिकारियों ने जांच की, तो बैंक के CCTV फुटेज से पुष्टि हुई कि जीतू न्याय के लिए भटक रहा था। वह डेथ सर्टिफिकेट और वारिस प्रमाण पत्र जैसी तकनीकी अनिवार्यताओं को समझ नहीं पा रहा था।

​प्रशासनिक फुर्ती: मामला गरमाते ही बीडीओ (BDO), एडिशनल तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक (RI) की टीम गांव पहुंची।

​मौके पर बने दस्तावेज: जो कागज हफ्तों से पेंडिंग थे, उन्हें चंद घंटों में गांव में ही तैयार कर लिया गया।

​आर्थिक मदद: रेड क्रॉस सोसाइटी की ओर से भी ₹20,000 की तत्काल सहायता प्रदान की गई।

​घर पहुंची बैंक की टीम, सौंपा ₹19,402 का चेक

​ओडिशा ग्रामीण बैंक के अधिकारियों ने आज जीतू मुंडा के घर जाकर कालरा के खाते में जमा ₹19,402 की राशि उसे और उसके भाइयों को सौंपी।

​”अब मैं अपनी बहन का अंतिम संस्कार और ‘सुधि’ कार्यक्रम पूरे विधि-विधान से कर सकूंगा। सिस्टम ने मेरी नहीं सुनी थी, लेकिन अब मुझे मेरा हक मिल गया है।” — जीतू मुंडा

​संपादकीय दृष्टिकोण: क्या ‘वायरल’ होना ही एकमात्र रास्ता है?

​जीतू की आंखों में आज संतोष के आंसू हैं, लेकिन यह घटना एक कड़वा सवाल छोड़ गई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार, ₹50,000 तक के क्लेम के लिए प्रक्रिया बेहद सरल है, जिसमें सरपंच का सत्यापन भी मान्य होता है। बावजूद इसके, एक भाई को अपनी बहन के अवशेष उठाने पड़े।

​यह मामला इस बात का प्रमाण है कि नियम चाहे कितने भी सरल हों, यदि उन्हें लागू करने वाले अधिकारियों के पास संवेदनशीलता नहीं है, तो एक गरीब के लिए न्याय की राह ‘कंकाल’ उठाने जितनी ही कठिन बनी रहेगी।

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