पाक-अफगान शांति वार्ता का नया दौर: इस्तांबुल में तालिबान से बातचीत, सीमा झड़प के बाद तनाव कम करने की कोशिश
पाक-अफगान शांति वार्ता का नया दौर: इस्तांबुल में तालिबान से बातचीत, सीमा झड़प के बाद तनाव कम करने की कोशिश
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। बृहस्पतिवार को तुर्की की मेजबानी में इस्तांबुल में शांति वार्ता फिर से शुरू हो रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे से निपटना और दोनों पक्षों के बीच बढ़ते तनाव को रोकना है। यह वार्ता अफगान तालिबान के प्रतिनिधिमंडल और पाकिस्तानी अधिकारियों के बीच होगी, जिसमें तुर्की के विदेश मंत्रालय के विशेष दूत की भूमिका अहम रहेगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व में पाकिस्तानी टीम शामिल होगी, जबकि तालिबान की ओर से विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी उपस्थित होंगे।
यह वार्ता 11 अक्टूबर को दुर्खान-चमन सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद हो रही है, जिसमें दोनों पक्षों को भारी जनहानि हुई। पाकिस्तानी सेना के अनुसार, उस झड़प में कम से कम 206 अफगान तालिबान लड़ाके और 110 तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के सदस्य मारे गए, जबकि पाकिस्तान के 23 सैनिक शहीद हो गए। अफगान पक्ष ने पाकिस्तान के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी सेना ने सीमा घुसपैठ का जवाब दिया था, और हानि न्यूनतम थी। यह घटना द्विपक्षीय संबंधों को सबसे निचले स्तर पर ले गई, जहां पाकिस्तान ने अफगान सीमा पर बाड़ लगाने का काम तेज कर दिया और TTP के खिलाफ ऑपरेशन लॉन्च किया। TTP, जो अफगानिस्तान में तालिबान शासन के बाद सक्रिय हो गया, पाकिस्तान में कई हमलों का जिम्मेदार माना जाता है।
वार्ता का एजेंडा सीमा सुरक्षा, आतंकवादियों के प्रत्यर्पण और व्यापारिक मार्गों को बहाल करने पर केंद्रित है। पाकिस्तान का मानना है कि अफगान तालिबान TTP को शरण दे रहा है, जबकि काबुल का आरोप है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI उइगर और बालूच विद्रोहियों को समर्थन दे रही है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान ने व्यक्तिगत रूप से दोनों पक्षों को आमंत्रित किया था, क्योंकि तुर्की अफगान शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत रोशेम दीदार ने वार्ता का स्वागत करते हुए कहा, “यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सकारात्मक है।”
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने वार्ता से पहले कहा, “हम शांति चाहते हैं, लेकिन आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेंगे। तालिबान से अपेक्षा है कि वे TTP पर कार्रवाई करें।” अफगान पक्ष ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना ठोस समझौते के तनाव बरकरार रहेगा। पिछले साल 2024 में दोहा में हुई इसी तरह की वार्ता विफल रही थी, जब TTP ने पाकिस्तान में हमला कर दिया।
यह वार्ता दक्षिण एशिया के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अफ-पाक तनाव भारत को भी प्रभावित करता है। क्या इस्तांबुल की मेजबानी सफल होगी? बृहस्पतिवार का दिन बताएगा। फिलहाल, सीमा पर सैनिक सतर्क हैं, लेकिन शांति की उम्मीद बंधी है।
