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दिल्ली में क्लाउड सीडिंग फेल: अनुकूल मौसम की कमी बनी बड़ी वजह, विशेषज्ञों ने बताया ‘गिमिक’

दिल्ली में क्लाउड सीडिंग फेल: अनुकूल मौसम की कमी बनी बड़ी वजह, विशेषज्ञों ने बताया ‘गिमिक’

नई दिल्ली: दिल्ली सरकार की कृत्रिम बारिश पैदा करने वाली महत्वाकांक्षी क्लाउड सीडिंग परियोजना को मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को बड़ा झटका लगा। आईआईटी कानपुर की सेस्ना 206H विमान ने बुराड़ी, करोल बाग और उत्तर-पश्चिम दिल्ली के इलाकों पर सिल्वर आयोडाइड नैनोपार्टिकल्स का छिड़काव किया, लेकिन बारिश नहीं हुई। पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने इसे ‘सफल परीक्षण’ बताया, लेकिन वास्तव में यह फेल हो गया। आखिर क्यों नाकाम रही यह कोशिश? आइए, जानते हैं मुख्य कारण।

1. नमी की भारी कमी: 50% जरूरी, लेकिन सिर्फ 20% उपलब्ध

क्लाउड सीडिंग के लिए बादलों में कम से कम 50% नमी (मॉइश्चर) जरूरी होती है, ताकि रसायन बर्फ के क्रिस्टल बनाकर बारिश को ट्रिगर कर सकें। लेकिन दिल्ली के ऊपर वातावरण में नमी का स्तर मात्र 20% से कम था। इंडियन मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) के अनुसार, सुबह की खराब दृश्यता (विजिबिलिटी) और नमी की कमी के कारण विमान को दोपहर 12:30 बजे ही टेकऑफ मिला। IIT कानपुर के प्रोजेक्ट लीडर प्रोफेसर सच्चिदानंद शर्मा ने कहा, “नमी 20% से कम होने पर बारिश संभव ही नहीं। यह मौसम की मार है।”

2. उपयुक्त बादलों का अभाव: पोस्ट-मानसून में मुश्किल

दिल्ली में पोस्ट-मानसून सीजन (अक्टूबर-दिसंबर) में प्रदूषण चरम पर होता है, लेकिन सही प्रकार के बादल (निम्बोस्ट्रेटस, 500-6000 मीटर ऊंचाई वाले) नहीं बनते। IMD ने बताया कि 22 अक्टूबर को कोई उपयुक्त बादल नहीं थे, और अगला विंडो 25 अक्टूबर के बाद ही संभव था। विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों में धुंध और इनवर्शन लेयर बादलों को रोकती है, जिससे सीडिंग बेकार साबित होती है। IIT दिल्ली के प्रोफेसर कृष्णा अच्युत राव ने ‘द हिंदू’ में लिखा, “यह विज्ञान का गलत इस्तेमाल है। सही बादल न होने पर रसायन बर्बाद होते हैं।”

3. प्रदूषण के मूल कारणों पर ध्यान न देना: अस्थायी समाधान

क्लाउड सीडिंग से प्रदूषण अस्थायी रूप से कम हो सकता है (1-2 दिन), लेकिन PM2.5 कण फिर वापस लौट आते हैं। दिल्ली का AQI मंगलवार को 306 (बहुत खराब) रहा, जो प्रदूषण के स्रोतों – पराली जलाना, वाहन उत्सर्जन, उद्योग – को नजरअंदाज करने का परिणाम है। सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज के प्रोफेसर शाहजाद गनी ने इसे ‘गिमिक’ कहा, “यह स्मॉग टावरों जैसा है – महंगा लेकिन अप्रभावी। रसायनों के लॉन्ग-टर्म प्रभाव (कृषि, स्वास्थ्य पर) का कोई अध्ययन नहीं।”

4. बार-बार देरी और मौसमी चुनौतियां

परियोजना मई से चल रही थी, लेकिन मई अंत, जून, अगस्त, सितंबर और मध्य-अक्टूबर में खराब मौसम के कारण टली। 22 अक्टूबर को IMD ने बादलों की कमी बताई। कुल लागत 3.21 करोड़ रुपये के बावजूद, पांच ट्रायल्स में से पहला ही फेल हो गया। अगला ट्रायल उसी दिन आउटर दिल्ली में प्लान है, लेकिन मौसम अनुकूल न होने पर मेरठ एयरपोर्ट पर विमान रुकेगा।

क्या आगे संभव है?

विशेषज्ञों का मानना है कि क्लाउड सीडिंग दिल्ली के लिए ‘स्नेक ऑयल सॉल्यूशन’ है – जादुई इलाज नहीं। मूल समस्याओं पर फोकस जरूरी: GRAP-2 लागू है, गैर-BS-VI वाहनों पर 29 अक्टूबर से बैन। अगर नमी बढ़ी, तो 29 अक्टूबर को बारिश हो सकती है। लेकिन लंबे समय के लिए स्रोतों पर नियंत्रण ही रास्ता है। कुल मिलाकर, यह असफलता दिल्ली की हवा साफ करने की जद्दोजहद को उजागर करती है।

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