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भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद पर विदेश मंत्री जयशंकर का बयान: ‘रेड लाइन्स का सम्मान जरूरी, व्यापार सामान्य रूप से चल रहा’

भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद पर विदेश मंत्री जयशंकर का बयान: ‘रेड लाइन्स का सम्मान जरूरी, व्यापार सामान्य रूप से चल रहा’

भारत और अमेरिका के बीच चल रहे टैरिफ विवाद को सुलझाने के प्रयासों पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को साफ लकीर खींची। उन्होंने कहा कि दोनों देश सक्रिय रूप से बातचीत में जुटे हैं और उन्हें भरोसा है कि यह मतभेद व्यापक व्यापारिक रिश्तों पर असर नहीं डालेगा। जयशंकर कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव (KEC 2025) में ‘टर्बुलेंट टाइम्स में फॉरेन पॉलिसी शेपिंग’ सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि ज्यादातर व्यापार “बिजनेस ऐज़ यूजुअल” चल रहा है, लेकिन भारत की “रेड लाइन्स” का सम्मान अनिवार्य है।

जयशंकर ने विवाद की जड़ को स्पष्ट करते हुए कहा, “हमारे बीच कुछ मुद्दे हैं क्योंकि हम किसी साझा बिंदु (लैंडिंग ग्राउंड) तक नहीं पहुंच पाए हैं। इसी वजह से टैरिफ लगाए गए हैं।” उन्होंने खुलासा किया कि मार्च से चल रही बातचीत में भारतीय निर्यात पर लगे 50% टैरिफ (25% सामान्य + 25% रूसी तेल खरीद से जुड़े) पर फोकस है। विदेश मंत्री ने इसे “अनफेयर” करार दिया, लेकिन आश्वासन दिया कि ऊर्जा व्यापार सहित सभी क्षेत्रों पर असर सीमित रहेगा। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि यह हर क्षेत्र पर असर डालेगा। कुछ मामलों में बातचीत जरूरी होगी, लेकिन ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं।”

रेड लाइन्स और किसानों का हित प्राथमिक

जयशंकर ने जोर दिया कि अमेरिका के साथ समझौता जरूरी है, क्योंकि वह दुनिया का नंबर वन मार्केट है और कई देशों ने उसके साथ मतभेद सुलझा लिए हैं। लेकिन उन्होंने साफ कहा, “कुछ चीजें नेगोशिएट हो सकती हैं, कुछ नहीं। भारत की रेड लाइन्स का सम्मान होना चाहिए।” विशेष रूप से किसानों और छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि रूसी तेल खरीद पर लगे टैरिफ को “ऑयल डिस्प्यूट” के रूप में गलत पेश किया जा रहा है। “अगर अमेरिका को समस्या है, तो भारत से तेल न खरीदें। लेकिन अन्य देशों (जैसे चीन और यूरोप) को रूस से तेल खरीदने पर दंड क्यों नहीं?”

वैश्विक व्यापार पर चिंता: टैरिफ ने बदल दी परिभाषा

विदेश मंत्री ने वैश्विक व्यापार के बदलते परिदृश्य पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “जब दुनिया में व्यापार का सबसे बड़ा आधार टैरिफ बन जाए, तो कॉम्परेटिव और कॉम्पिटिटिव एडवांटेज का क्या मतलब रह जाता है?” जयशंकर ने रूल्स-बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर के कमजोर होने का जिक्र किया, जो सैंक्शंस, क्रिप्टोकरेंसी के उदय और अमेरिका के ऊर्जा निर्यातक बनने से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने चीन के रिन्यूएबल्स में दबदबे पर भी इशारा किया।

एफटीए रणनीति: प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं से सावधानी

जयशंकर ने भारत की एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स) रणनीति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एशिया के कई देशों के साथ समझौते हो चुके हैं, लेकिन इनमें प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जो सप्लाई चेन के जरिए चीन के लिए रास्ता खोल देती हैं। “हमारा फोकस अब ऐसे देशों पर होना चाहिए जो हमारे साथ प्रतिस्पर्धा में न हों।” उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग में “लॉस्ट डिकेड्स” का जिक्र करते हुए उन्नत और पारंपरिक सेक्टर्स में क्षमता निर्माण की जरूरत बताई।

व्यापारिक संबंधों की मजबूती

भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 में 190 बिलियन डॉलर को पार कर चुका है, जो विवाद के बावजूद मजबूत बने हुए हैं। जयशंकर ने कहा कि भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति कई साझेदारियों को संतुलित रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विवाद सुलझता है, तो भारत के निर्यात को 20-25% बूस्ट मिल सकता है। सितंबर में हुई पांचवें दौर की बातचीत सकारात्मक रही, और अगला दौर जल्द अपेक्षित है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ एजेंडे ने तनाव बढ़ाया है। जयशंकर का आश्वासन दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने का संकेत देता है।

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