अन्तर्राष्ट्रीय

‘बेटियों को मदरसे भेजो वरना…’ कट्टरता पर उतरा अफगानिस्तान, तालिबान का नया फरमान

‘बेटियों को मदरसे भेजो वरना…’ कट्टरता पर उतरा अफगानिस्तान, तालिबान का नया फरमान

अफगानिस्तान में तालिबान शासन की कट्टरता ने एक बार फिर महिलाओं के अधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 22 सितंबर 2025 को जारी एक नए फरमान के तहत, तालिबान ने लड़कियों की उच्च शिक्षा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। अब परिवारों को सख्त हिदायत दी गई है कि अपनी बेटियों को स्कूल या यूनिवर्सिटी न भेजकर, उन्हें केवल मदरसों में दाखिला दिलाएं। फरमान न मानने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का ऐलान किया गया है, जिसमें जुर्माना, सामाजिक बहिष्कार और यहां तक कि सख्त सजाएं शामिल हैं। तालिबान का दावा है कि यह कदम ‘इस्लामी मूल्यों’ की रक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे महिलाओं के खिलाफ क्रूर दमन करार दे रहा है।

इस फरमान का असर अफगानिस्तान के लाखों परिवारों पर पड़ रहा है। हेरात शहर की रहने वाली नाहिद, जो कभी डॉक्टर बनने का सपना देखती थी, अब अपनी सुबहें एक मस्जिद के बेसमेंट में बने मदरसे में बिताती हैं। वह बताती हैं, “मेरा सपना टूट गया। अब सिर्फ कुरान और धार्मिक शिक्षा ही हमारी किस्मत है।” इसी तरह, एक अन्य महिला नासरीन ने खुलासा किया कि स्थानीय मौलवी ने उनके परिवार को धमकी दी, “अगर बेटियों को मदरसे नहीं भेजोगे तो तुम्हें सरकारी सहायता या कोई सुविधा नहीं मिलेगी।” तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ही लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदियां बढ़ती जा रही हैं। 2021 में प्राइमरी स्कूलों तक सीमित रह गई शिक्षा अब पूरी तरह मदरसा-केंद्रित हो चुकी है।

यह फरमान संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों के लिए झटका है। यूएन वुमेन की रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में 13 लाख लड़कियां पहले ही शिक्षा से वंचित हो चुकी हैं। तालिबान का यह कदम न केवल शिक्षा का अधिकार छीन रहा है, बल्कि महिलाओं को समाज से अलग-थलग करने की साजिश है। पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी की बेटी ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह मध्ययुगीन अंधकार है। दुनिया को जागना होगा।” अफगान महिलाएं चुपचाप विरोध कर रही हैं, लेकिन दमन का साया भारी है।

अफगानिस्तान की यह घटना वैश्विक स्तर पर महिलाओं के संघर्ष को उजागर करती है। क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव तालिबान को झुकाएगा? सवाल अभी अनुत्तरित है, लेकिन लड़कियों का भविष्य दांव पर लटका हुआ है।

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