Tuesday, June 9, 2026
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संघर्ष और संकल्प की मिसाल देवेंद्र झाझरिया: पैरालंपिक में 3 पदक जीतने वाले देश के पहले एकल एथलीट

संघर्ष और संकल्प की मिसाल देवेंद्र झाझरिया: पैरालंपिक में 3 पदक जीतने वाले देश के पहले एकल एथलीट

​देवेंद्र झाझरिया की गिनती भारत के सबसे सफल और सम्मानित पैरा एथलीट्स में होती है। भाला फेंक (जैवलिन थ्रो) के इस दिग्गज खिलाड़ी ने देश के लिए तीन पैरालंपिक पदक जीतकर इतिहास रचा है। बचपन में एक दर्दनाक हादसे में अपना एक हाथ गंवाने के बावजूद देवेंद्र ने जिस तरह खेल जगत में अपनी धाक जमाई, वह संघर्ष, दृढ़ संकल्प और उत्कृष्ट खेल भावना की एक अद्वितीय और प्रेरक मिसाल है।

​महज 8 साल की उम्र में गंवाना पड़ा हाथ

​देवेंद्र झाझरिया का जन्म 10 जून 1981 को राजस्थान के चुरू जिले में हुआ था। बचपन में वे बेहद उत्साही और चंचल थे, लेकिन एक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी। सिर्फ 8 साल की उम्र में एक पेड़ पर चढ़ते समय वे अनजाने में शाखा पर लिपटे बिजली के हाई वोल्टेज तार के संपर्क में आ गए। करंट इतना जोरदार था कि ग्रामीणों को लगा कि देवेंद्र का बचना मुश्किल है। डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने के लिए तुरंत उनका बायां हाथ काटने की सलाह दी।

​इस हादसे के बाद देवेंद्र का जीवन पूरी तरह बदल गया। दूसरे बच्चे उन्हें अपने साथ खिलाने में कतराते थे, जिससे वे खुद को अकेला महसूस करने लगे थे। लेकिन इस अकेलेपन को उन्होंने अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।

​एथेंस 2004 से टोक्यो 2020 तक पैरालंपिक में रचा इतिहास

​देवेंद्र ने स्कूल के दिनों से ही भाला फेंक (जैवलिन थ्रो) प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। साल 1997 में एक पैरा-एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान कोच रिपुदमन सिंह की नजर उनकी प्रतिभा पर पड़ी और उन्होंने देवेंद्र को इस खेल को गंभीरता से लेने की सलाह दी। इसके बाद देवेंद्र ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा:

​एथेंस पैरालंपिक (2004): महज 23 साल की उम्र में देवेंद्र ने अपने पहले पैरालंपिक में क्वालीफाई किया। उन्होंने F46 भाला फेंक स्पर्धा में 62.15 मीटर के तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक (Gold) जीतकर दुनिया को चौंका दिया।

​रियो पैरालंपिक (2016): अगले दो पैरालंपिक खेलों में F46 इवेंट को शामिल नहीं किए जाने के कारण उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा। लेकिन 2016 में वापसी करते हुए उन्होंने 63.97 मीटर के नए विश्व रिकॉर्ड थ्रो के साथ भारत को दूसरा स्वर्ण पदक दिलाया। इसी के साथ वे पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने।

​टोक्यो पैरालंपिक (2020): एक समय कैंसर से जूझ रहे अपने पिता राम सिंह की स्थिति देखकर देवेंद्र खेल छोड़ना चाहते थे, लेकिन उनके पिता के हौसले और प्रेरणा के कारण वे मैदान पर लौटे। टोक्यो में उन्होंने 64.35 मीटर के अपने सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ रजत पदक (Silver) जीता और पैरालंपिक इतिहास में तीन पदक जीतने वाले भारत के पहले एकल एथलीट बन गए।

​इसके अलावा, देवेंद्र ने 2014 के एशियन पैरा गेम्स में रजत पदक और आईपीसी वर्ल्ड चैंपियनशिप में एक स्वर्ण और एक रजत पदक भी अपने नाम किया है।

​पद्म भूषण पाने वाले देश के पहले पैरा एथलीट

​खेल के मैदान पर देश का गौरव बढ़ाने वाले देवेंद्र झाझरिया को सरकार और देशवासियों से भरपूर सम्मान मिला है। उनके नाम कई ऐतिहासिक राष्ट्रीय नागरिक और खेल पुरस्कार दर्ज हैं:

​2004: खेल में उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

​2012: देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजे गए।

​2017: खेल के सर्वोच्च सम्मान ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ (अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।

​2022: देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित होने वाले भारत के पहले पैरा एथलीट बने।

​एक साधारण से गांव से निकलकर वैश्विक पटल पर तिरंगा लहराने वाले देवेंद्र झाझरिया आज देश के लाखों युवाओं और दिव्यांगजनों के लिए रोल मॉडल हैं, जो यह सिखाते हैं कि मजबूत इच्छाशक्ति के आगे शारीरिक अक्षमता भी घुटने टेक देती है।

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