राजनीति

झारखंड राज्यसभा चुनाव में बढ़ा सस्पेंस: निर्दलीय परिमल नाथवाणी की एंट्री से बढ़ा क्रॉस वोटिंग का खतरा, कांग्रेस की बढ़ी चिंता

झारखंड राज्यसभा चुनाव में बढ़ा सस्पेंस: निर्दलीय परिमल नाथवाणी की एंट्री से बढ़ा क्रॉस वोटिंग का खतरा, कांग्रेस की बढ़ी चिंता

​झारखंड की 2 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाला मुकाबला अब बेहद दिलचस्प और रोमांचक मोड़ पर पहुंच गया है। मैदान में तीन दिग्गज उम्मीदवारों के आ जाने से राज्य का सियासी पारा पूरी तरह चढ़ चुका है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) से बैजनाथ राम और कांग्रेस से प्रणव झा ने जहां पालेबंदी तेज कर दी है, वहीं निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में परिमल नाथवाणी के मैदान में उतरने से पूरी जंग त्रिकोणीय हो चुकी है। इस मुकाबले में झामुमो जहां अपने संख्या बल को लेकर आश्वस्त है, वहीं कांग्रेस के खेमे में चिंता की लकीरें साफ देखी जा रही हैं।

​नाथवाणी की एंट्री और क्रॉस वोटिंग का पुराना इतिहास

​कांग्रेस की इस बढ़ती चिंता के पीछे निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी और झारखंड की राजनीति का पुराना इतिहास है।

​साल 2008 का इतिहास: वर्ष 2008 के राज्यसभा चुनाव में झामुमो के पास अपने 17 विधायक होने के बावजूद उनके आधिकारिक उम्मीदवार को महज 8 वोट मिले थे, और परिमल नाथवाणी ने भारी क्रॉस वोटिंग के दम पर बाजी मार ली थी। इसे आज भी राज्य के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा क्रॉस वोटिंग चैप्टर माना जाता है।

​साल 2014 का समीकरण: इसके बाद साल 2014 में भी नाथवाणी ने बिना किसी बड़ी टक्कर के झारखंड से दिल्ली (राज्यसभा) का टिकट कटाया था। यही वजह है कि उनकी मौजूदा दावेदारी ने सत्ताधारी गठबंधन की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

​आंकड़ों का खेल: महागठबंधन सुरक्षित, पर सेंधमारी का डर

​सैद्धांतिक रूप से देखें तो 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में सत्ताधारी महागठबंधन (INDIA ब्लॉक) के पास अपने दोनों उम्मीदवारों को आसानी से जिताने के लिए पर्याप्त संख्या बल (कुल 56 वोट) मौजूद है। किसी भी एक उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचने के लिए न्यूनतम 28 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता है।

​गठबंधन का मौजूदा गणित इस प्रकार है:

​झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM): झामुमो के पास कुल 34 वोट हैं। अपने उम्मीदवार बैजनाथ राम को 28 वोट देने के बाद भी पार्टी के पास 6 अतिरिक्त वोट बचते हैं, जिन्हें वह कांग्रेस उम्मीदवार को ट्रांसफर कर सकती है।

​कांग्रेस: पार्टी के पास अपने 16 विधायक (वोट) हैं। झामुमो के 6 अतिरिक्त वोटों और सहयोगियों की मदद से कांग्रेस आसानी से 28 का आंकड़ा छू सकती है।

​गठबंधन के अन्य दल: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के 4 वोट और भाकपा माले के 2 वोट भी महागठबंधन के पाले में हैं।

​एनडीए (NDA) का गणित: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास कुल 24 वोट हैं। इनमें बीजेपी के 21 विधायकों के साथ-साथ आजसू, जदयू और लोजपा के 1-1 विधायक शामिल हैं। यह पूरा कुनबा निर्दलीय परिमल नाथवाणी के साथ खड़ा है।

​अन्य: झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) का 1 विधायक वर्तमान में तटस्थ भूमिका में है।

​”मैं 100% कॉन्फिडेंट हूं”: नामांकन के बाद बोले नाथवाणी

​8 जून को अपना नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद परिमल नाथवाणी काफी आश्वस्त नजर आए। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा:

​”मैं झारखंड में पहले भी काम कर चुका हूं और यह मेरी कर्मभूमि है। मेरे संबंध सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से हैं। नामांकन दाखिल करने से पहले मैंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कई निर्दलीय विधायकों से भी मुलाकात की है। मैं अपनी जीत को लेकर 100 प्रतिशत कॉन्फिडेंट हूं।”

​उनका यह बयान साफ इशारा करता है कि नाथवाणी की पैठ सिर्फ एनडीए तक सीमित नहीं है, बल्कि वे महागठबंधन के भीतर भी सेंध लगाने की पूरी तैयारी में हैं।

​धनबल बनाम सिद्धांतों की राजनीति: आमने-सामने बीजेपी-कांग्रेस

​परिमल नाथवाणी को बीजेपी द्वारा खुला समर्थन दिए जाने पर कांग्रेस ने तीखा रुख अख्तियार कर लिया है। प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने आरोप लगाया कि बीजेपी सिद्धांतों और विचारधारा की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन राज्यसभा चुनाव आते ही उसने इसे लोकतंत्र के बजाय ‘धनबल’ (मनी पावर) का खेल बना दिया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी जनसंघर्ष से निकले नेताओं को आगे बढ़ाने के बजाय कॉरपोरेट और संसाधन संपन्न लोगों को प्राथमिकता दे रही है।

​दूसरी तरफ, बीजेपी विधायक दल के नेता और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पलटवार करते हुए कहा कि बीजेपी ने राज्य की तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए ही परिमल नाथवाणी को समर्थन देने का फैसला किया है। चूंकि बीजेपी के पास अपने दम पर सीट जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं था, इसलिए एक व्यापक रणनीतिक कदम के तहत नाथवाणी को आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने नाथवाणी को एक “टेस्टेड” व्यक्ति बताया जो पहले भी झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

​यह चुनाव अब स्थानीयता, आदिवासी और जनभावना के नैरेटिव बनाम कॉरपोरेट मैनेजमेंट की चाणक्य नीति के बीच एक बेहद कड़े रणनीतिक मुकाबले में तब्दील हो चुका है, जहां 18 जून को होने वाली वोटिंग में ही तय होगा कि जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा।

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