Monday, April 27, 2026
धर्म

सूर्य ग्रहण का सूतक भारत में नहीं लगेगा: 21-22 सितंबर को आंशिक ग्रहण, लेकिन दृश्यमान न होने से कोई प्रभाव नहीं

सूर्य ग्रहण का सूतक भारत में नहीं लगेगा: 21-22 सितंबर को आंशिक ग्रहण, लेकिन दृश्यमान न होने से कोई प्रभाव नहीं

2025 का आखिरी सूर्य ग्रहण 21-22 सितंबर की रात को होने वाला है, लेकिन भारत में इसका सूतक काल लागू नहीं होगा। खगोलशास्त्रियों और ज्योतिषियों के अनुसार, यह आंशिक सूर्य ग्रहण होगा, जो भारत में दृश्यमान नहीं होगा, इसलिए धार्मिक रूप से इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। ग्रहण 21 सितंबर को रात 10:59 बजे शुरू होकर 22 सितंबर को सुबह 3:23 बजे समाप्त होगा, जिसमें चरम बिंदु रात 1:11 बजे होगा। दक्षिणी गोलार्ध के देशों जैसे न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फिजी और अंटार्कटिका में इसे देखा जा सकेगा। भारतीय दर्शक यूट्यूब या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए इसे देख सकेंगे।

हिंदू परंपरा में सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले सूतक काल शुरू होता है, लेकिन यह केवल तभी लागू होता है जब ग्रहण स्थानीय स्थान पर दृश्यमान हो। इस बार भारत में रात्रि में होने के कारण कोई सूतक नहीं बसेगा। ज्योतिषी पंडित मनोज पाठक ने कहा, “ग्रहण के दौरान पृथ्वी का वातावरण अशुद्ध माना जाता है, इसलिए सूतक में पूजा-पाठ, भोजन और शुभ कार्य वर्जित होते हैं। लेकिन अदृश्य ग्रहण का कोई ज्योतिषीय प्रभाव नहीं पड़ता।” सरवा पितृ अमावस्या के दिन पड़ने से पितृ पक्ष के अंतिम दिन होने के बावजूद, सूतक की कोई पाबंदी नहीं होगी।

सूतक और पातक में अंतर समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों ही हिंदू धर्म में अशुद्धता के काल हैं, लेकिन इनके कारण और अवधि अलग-अलग हैं। सूतक मुख्य रूप से जन्म या ग्रहण से जुड़ा होता है। जन्म सूतक में नवजात शिशु के जन्म के बाद परिवार में 10-11 दिनों तक अशुद्धता मानी जाती है, जिसमें पूजा, मंदिर जाना और शुभ कार्य न करने के नियम होते हैं। यह मां और बच्चे को आराम देने और संक्रमण से बचाने का वैज्ञानिक आधार भी रखता है। ग्रहण सूतक में सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले और चंद्र ग्रहण से 9 घंटे पहले शुरू होता है, जो ग्रहण समाप्ति तक चलता है। इस दौरान भोजन, जल और पूजा वर्जित होते हैं, क्योंकि ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ी मानी जाती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, सूतक अशुद्धता को शुद्ध करने का माध्यम है।

वहीं, पातक मृत्यु से जुड़ा होता है और इसे ‘आशौच’ भी कहा जाता है। किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु पर पातक काल शुरू होता है, जो 13 दिनों तक सख्ती से पालन किया जाता है। इस दौरान मृतक के सगे-संबंधी पूजा-पाठ, विवाह और अन्य शुभ कार्यों से दूर रहते हैं। अवधि रिश्ते के आधार पर बदलती है—सपिंड (सगे रिश्तेदार) के लिए 10-13 दिन, जबकि ब्राह्मचारी या साधु के लिए सूतक लागू नहीं होता। पातक का उद्देश्य आत्मा की शांति के लिए प्रायश्चित और परिवार को शोक में एकांत देना है। गरुड़ पुराण में वर्णित है कि पातक के बाद हड्डियों का विसर्जन, स्नान और ब्राह्मण भोजन से समाप्ति होती है। सूतक जन्म या ग्रहण की सकारात्मक-नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा है, जबकि पातक मृत्यु की अशुद्धता से। दोनों ही आध्यात्मिक शुद्धि और सामाजिक अनुशासन के प्रतीक हैं।

यह ग्रहण वैज्ञानिक रूप से रोचक है, लेकिन भारत में धार्मिक प्रतिबंध न होने से पितृ पक्ष के समापन पर कोई बाधा नहीं आएगी। खगोल वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि दृश्यमान क्षेत्रों में आंखों की सुरक्षा के लिए विशेष चश्मा जरूरी है।

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