वैश्विक तेल-गैस भंडारों में तेज कमी: IEA की चेतावनी, भारत पर संकट
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने एक नई रिपोर्ट में वैश्विक तेल और गैस भंडारों के तेजी से घटने की चेतावनी जारी की है, जो आयात पर निर्भर देशों जैसे भारत के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। रिपोर्ट ‘तेल और गैस क्षेत्रों की कमी के प्रभाव’ (The Implications of Oil and Gas Field Decline Rates) में कहा गया है कि वैश्विक तेल और गैस क्षेत्रों की उत्पादन क्षमता तेजी से कम हो रही है, जिससे आपूर्ति और कीमतों में अस्थिरता बढ़ सकती है। IEA के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने इसे “तेल और गैस निवेश आवश्यकताओं पर चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के लगभग 15,000 तेल और गैस क्षेत्रों के डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि पारंपरिक तेल उत्पादन की वार्षिक कमी दर औसतन 5.6 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की 6.8 प्रतिशत हो गई है। यह वृद्धि मुख्य रूप से शेल (शेल गैस) और गहन समुद्री संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता के कारण है, जो पारंपरिक स्थलीय क्षेत्रों की तुलना में तेजी से समाप्त होते हैं। IEA का अनुमान है कि 2050 तक उत्पादन को स्थिर रखने के लिए प्रतिदिन 45 मिलियन बैरल तेल और लगभग 2,000 अरब घन मीटर नई पारंपरिक गैस क्षमता की आवश्यकता होगी, जो दुनिया के शीर्ष तीन उत्पादकों के संयुक्त उत्पादन के बराबर है। वर्तमान में, अपस्ट्रीम तेल और गैस निवेश का लगभग 90 प्रतिशत मौजूदा क्षेत्रों की प्राकृतिक कमी को पूरा करने में खर्च हो रहा है, जबकि आपूर्ति विस्तार के लिए बहुत कम हिस्सा बचा है।
भारत के लिए यह चेतावनी विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि देश अपनी क्रूड ऑयल की 85 प्रतिशत से अधिक और गैस की 45 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी करता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नए परियोजनाओं में देरी भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है, जिससे ईंधन कीमतें बढ़ सकती हैं और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों में ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति की कमी से संकट गहरा सकता है। IEA ने चेतावनी दी है कि बिना निरंतर निवेश के, दुनिया ब्राजील और नॉर्वे के संयुक्त तेल उत्पादन के बराबर आपूर्ति खो सकती है, जो बाजारों और ऊर्जा सुरक्षा पर गहरा प्रभाव डालेगा।
IEA ने इस समस्या से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की सिफारिश की है। उत्पादकों को मौजूदा क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना होगा, जबकि आयात-निर्भर देशों को ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, घरेलू अन्वेषण और स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों जैसे सौर, पवन और इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर देना चाहिए। भारत के संदर्भ में, रिपोर्ट सुझाव देती है कि सरकार को नई खोज परियोजनाओं को तेज करना, रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि नेट जीरो लक्ष्यों के बीच जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना आवश्यक है, अन्यथा वैश्विक ऊर्जा संकट अनिवार्य हो जाएगा।
यह रिपोर्ट वैश्विक ऊर्जा नीतियों में बदलाव की मांग करती है, ताकि सतत विकास सुनिश्चित हो सके। भारत को अब अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा, अन्यथा आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है।
