अन्तर्राष्ट्रीय

संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख: UNSC सुधारों और ‘डी फैक्टो वीटो’ पर पी. हरीश का दो-टूक बयान

संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख: UNSC सुधारों और ‘डी फैक्टो वीटो’ पर पी. हरीश का दो-टूक बयान

​संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) में सुरक्षा परिषद (UNSC) के सुधारों और वीटो के अधिकारों को लेकर हुई उच्चस्तरीय बहस में भारत ने बेहद स्पष्ट और मुखर रुख अपनाया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने सोमवार को चर्चा के दौरान ‘डी फैक्टो वीटो’ (छिपे हुए और अप्रत्यक्ष वीटो) की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वीटो कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का अहसास कराता है।

​1. ‘आम सहमति’ के आड़ में ‘डी फैक्टो वीटो’ का इस्तेमाल:

​आईजीएन (IGN) प्रक्रिया में रुकावट: भारतीय प्रतिनिधि ने बताया कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए ‘इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स’ (Intergovernmental Negotiations) एक अहम मंच था, लेकिन कुछ देशों द्वारा इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।

​’यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (UfC) समूह की भूमिका: इटली और पाकिस्तान के नेतृत्व वाले इस छोटे समूह ने प्रक्रियात्मक पैंतरों और ‘आम सहमति’ (Consensus) के अलिखित नियम का इस्तेमाल करके आईजीएन को किसी भी मसौदे पर आगे बढ़ने से रोक दिया है।

​पी. हरीश ने स्पष्ट किया कि 2008 का महासभा प्रस्ताव ‘आम सहमति’ के बजाय ‘अधिकतम राजनीतिक स्वीकृति’ के सिद्धांत पर आधारित था, लेकिन बातचीत के 17 दौर बीत जाने के बाद भी व्यावहारिक वीटो के कारण कोई नतीजा नहीं निकल पाया है।

​2. सुरक्षा परिषद के फैसलों में ‘गुप्त वीटो’:

​भारतीय प्रतिनिधि ने उस अदृश्य और अनधिकृत ‘डी फैक्टो वीटो’ का भी पर्दाफाश किया, जिसका इस्तेमाल संयुक्त राष्ट्र चार्टर में औपचारिक रूप से कोई स्थान नहीं मिला है:

​परिषद के हर सदस्य के पास अप्रत्यक्ष ताकत: अध्यक्षीय बयानों, प्रेस बयानों और प्रतिबंध समितियों (Sanctions Committees) के फैसलों में ‘आम सहमति’ के नियम के नाम पर कोई भी एक सदस्य बिना कोई कारण बताए किसी प्रस्ताव को रोक सकता है।

​आतंकवादियों को बचाने की कुटिल चालें: चीन जैसी ताकतों द्वारा प्रतिबंध समितियों की गुप्त बैठकों में पाकिस्तान स्थित कुख्यात आतंकवादियों—जैसे लश्कर-ए-तैयबा के जकी-उर-रहमान लखवी व शाहिद महमूद, और जैश-ए-मोहम्मद के साजिद मीर व मसूद अजहर—पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्तावों को इसी ‘गुप्त वीटो’ के जरिए बार-बार रोका गया है।

​3. भारत की प्रमुख मांगें और सिद्धांत:

​व्यापक सुधार और नए स्थायी सदस्य: भारत ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता केवल वीटो को मैनेज करने से नहीं आएगी, बल्कि परिषद का विस्तार करने और नई वास्तविकताओं के आधार पर नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने से आएगी।

​वीटो पर समान अधिकार: भारत ने अपने सिद्धांत-आधारित रुख को दोहराते हुए कहा कि जब तक वीटो का प्रावधान अस्तित्व में है, सुधार के बाद परिषद में शामिल होने वाले सभी नए स्थायी सदस्यों के पास भी यह अधिकार होना चाहिए। निष्पक्षता और न्याय की यही मांग है।

​’सेकंड क्लास’ सदस्यता को खारिज: भारत ने सुरक्षा परिषद में सदस्यता की कोई नई ‘दूसरे दर्जे’ की श्रेणी (जैसे बिना वीटो वाले स्थायी सदस्य या लंबे कार्यकाल वाले सदस्य) बनाने के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया, क्योंकि इससे असमानता और गहरी होगी।

​निष्कर्ष:

​पी. हरीश ने इस बात पर भी संदेह जताया कि वीटो का इस्तेमाल करने वाले देशों को महासभा में आकर स्पष्टीकरण देने की व्यवस्था से कोई बड़ा बदलाव आया है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र को आठ दशक पुराने युद्ध के नतीजों के बजाय आज की वैश्विक वास्तविकताओं को दर्शाने वाली संस्था बनना चाहिए, जिसके लिए स्पष्ट समय-सीमा और लक्ष्यों के साथ मसौदे पर आधारित बातचीत जल्द शुरू होनी चाहिए।

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