जब संकट में पड़े लक्ष्मण जी के प्राण, तब विभीषण ने दिखाया धर्म का मार्ग और दिया जीवनदान का सूत्र
जब संकट में पड़े लक्ष्मण जी के प्राण, तब विभीषण ने दिखाया धर्म का मार्ग और दिया जीवनदान का सूत्र
नई दिल्ली:
सनातन धर्म के महान ग्रंथ रामायण में लंका युद्ध का हर प्रसंग सत्य और असत्य के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। युद्ध के एक कठिन क्षण में रावण के पुत्र मेघनाद ने अपनी मायावी शक्तियों और अमोघ शक्ति बाण का प्रयोग कर भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण जी को मूर्छित कर दिया था। इस घटना से पूरी वानर सेना और स्वयं भगवान श्री राम गहरे संकट में आ गए थे।
विभीषण का मार्गदर्शन और संकटमोचन मार्ग:
जब लंका के राजवैद्य सुषेण ने बताया कि लक्ष्मण जी के प्राण केवल हिमालय की संजीवनी बूटी से ही बच सकते हैं, तब रावण के भाई विभीषण ने आगे आकर संबल दिया। धर्म का पक्ष लेने वाले विभीषण ने राजवैद्य के साथ मिलकर उस गुप्त औषधि और उपाय के बारे में विस्तार से जानकारी दी, जिससे इस विकट परिस्थिति का समाधान निकाला जा सकता था।
समय रहते संजीवनी लाने में निभाई मुख्य भूमिका:
विभीषण ने ही वानर सेना को सचेत किया कि सूर्योदय से पूर्व संजीवनी बूटी का पहुंचना अत्यंत आवश्यक है। उनके सटीक मार्गदर्शन के आधार पर ही हनुमान जी द्रोणगिरि पर्वत की पहचान करने में सफल रहे और समय रहते पूरा पर्वत उठाकर ले आए। इसके बाद वैद्य सुषेण ने संजीवनी बूटी से उपचार कर लक्ष्मण जी को नया जीवन दिया।
धर्म और सत्य के साथ खड़े रहने की मिसाल:
रावण के कुल का होने के बावजूद विभीषण का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने हमेशा अधर्म के बजाय धर्म का मार्ग चुना। संकट की उस घड़ी में उनकी सही सलाह और निष्ठा ने न केवल लक्ष्मण जी के प्राण बचाए, बल्कि लंका विजय की राह भी आसान की। यह प्रसंग आज भी हमें यही शिक्षा देता है कि परिस्थितियां चाहे जो भी हों, सत्य और धर्म का साथ देने वाले का स्थान हमेशा सर्वोपरि रहता है।
(डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है।)
