राजा परीक्षित के श्राप से मोक्ष तक की पौराणिक कथा: जानिए कैसे कलयुग के प्रभाव में बदला इतिहास
राजा परीक्षित के श्राप से मोक्ष तक की पौराणिक कथा: जानिए कैसे कलयुग के प्रभाव में बदला इतिहास
हस्तिनापुर: सनातन धर्म के महान ग्रंथों, महाभारत और भागवत पुराण के अनुसार, पांडवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित ने हस्तिनापुर का शासन संभाला था। अपने न्यायप्रिय और कुशल नेतृत्व के लिए जाने जाने वाले राजा परीक्षित के काल में प्रजा अत्यंत सुखी थी। हालांकि, कलयुग के आगमन और उसके प्रभाव के कारण उनके जीवन में एक अभूतपूर्व मोड़ आया।
आश्रम की घटना और ऋषि का अपमान
एक बार शिकार के दौरान अत्यधिक थकान और प्यास से व्याकुल होकर राजा परीक्षित जंगल में स्थित ऋषि शमीक के आश्रम पहुँचे। उस समय ऋषि ध्यानमग्न थे और मौन व्रत धारण किए हुए थे। राजा द्वारा बार-बार जल माँगने पर भी जब ऋषि की तंद्रा नहीं टूटी, तो कलयुग के प्रभाव में आकर राजा ने पास में पड़ा एक मृत सर्प ऋषि के गले में डाल दिया।
शृंगी ऋषि का श्राप और राजा का प्रायश्चित
जब ऋषि शमीक के पुत्र शृंगी ऋषि को इस घटना का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने क्रोधित होकर राजा को शाप दिया कि आज से ठीक सातवें दिन नागराज तक्षक के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। राजा परीक्षित को जब अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने भयभीत होने के बजाय प्रायश्चित का मार्ग चुना। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम सात दिन गंगा तट पर महर्षि शुकदेव जी से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करते हुए व्यतीत किए।
मोक्ष की प्राप्ति और सर्प सत्र यज्ञ
सातवें दिन सुरक्षा के तमाम इंतजामों के बावजूद नागराज तक्षक ने सूक्ष्म रूप धारण कर फल के माध्यम से राजा परीक्षित को डस लिया। कथा श्रवण के प्रभाव से राजा को मोक्ष की प्राप्ति हुई। बाद में, अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए उनके पुत्र जनमेजय ने प्रसिद्ध ‘सर्प सत्र’ यज्ञ का आयोजन किया था।
