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फिल्म रिव्यू: ‘द इंडिया स्टोरी’—खाद्य सुरक्षा और साइलेंट किलर कीटनाशकों पर एक जरूरी सामाजिक दस्तक

फिल्म रिव्यू: ‘द इंडिया स्टोरी’—खाद्य सुरक्षा और साइलेंट किलर कीटनाशकों पर एक जरूरी सामाजिक दस्तक

​मुंबई: खान-पान की शुद्धता और खाद्य पदार्थों में मिलावट को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे दौर में जब उपभोक्ता ऑर्गेनिक विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं, लेखक सागर बी शिंदे और निर्देशक चेतन डीके की फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’ एक बेहद संवेदनशील और समकालीन मुद्दे को बड़े पर्दे पर लेकर आई है। यह फिल्म कृषि क्षेत्र में जहरीले कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल और उससे आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे जानलेवा असर (जैसे कैंसर) पर प्रकाश डालती है।

​कहानी का ताना-बाना

​फिल्म की कहानी पूर्व आर्मी मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी सात साल की बेटी परी (त्रिषा सारडा) को कीटनाशकों के जहरीले तत्वों से हुए ब्लड कैंसर के कारण खो देते हैं।

​कानूनी लड़ाई की शुरुआत: अपनी मासूम बेटी की मौत से टूटे योगेश न्याय के लिए बहुराष्ट्रीय कीटनाशक कंपनियों, शासन और लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कानूनी जंग छेड़ने का फैसला करते हैं।

​अदालती मोड़: उनका साथ देती हैं पहली बार केस लड़ रही वकील अर्चना (काजल अग्रवाल)। कोर्ट द्वारा नियुक्त जांच अधिकारी आईजी विजय राठौड़ (मुरली शर्मा) पूरे देश में घूम-घूमकर इस धांधली की पड़ताल करते हैं।

​वास्तविक संदर्भ: जांच के दौरान कहानी पंजाब की ‘कैंसर ट्रेन’ और केरल के कासरगोड कीटनाशक त्रासदी जैसी वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं को भी बखूबी छूती है।

​कलाकारों का प्रदर्शन

​श्रेयस तलपड़े: एक पीड़ित और संघर्षरत पिता के रूप में श्रेयस तलपड़े का अभिनय बेहद प्रभावी और निष्ठावान है। क्लाइमेक्स में उनका मोनोलॉग एक सैनिक और पिता दोनों के दर्द को जीवंत कर देता है।

​त्रिषा सारडा (बाल कलाकार): बीमारी के दौर से गुजरती मासूम बच्ची के रूप में त्रिषा का अभिनय दर्शकों को अंदर तक झकझोर देता है।

​काजल अग्रवाल व अन्य: काजल अग्रवाल ने वकील के रूप में ठीक-ठाक काम किया है, हालांकि भावुक दृश्यों में उनकी अभिव्यक्ति थोड़ी असमान लगती है। मुरली शर्मा (जांच अधिकारी) और मनीष वाधवा (विपक्षी वकील) ने कहानी को अच्छा सहारा दिया है।

​निर्देशन और तकनीकी पक्ष

​निर्देशक चेतन डीके फिल्म के मूल संदेश को पहुंचाने में काफी हद तक सफल रहे हैं। मुंबई के अस्पतालों में एक आम परिवार के संघर्ष और तंगहाली का चित्रण बहुत ही वास्तविकता के साथ किया गया है।

​वे पहलू जहां फिल्म कमजोर रही:

​संपादन और गति: एडिटिंग में निरंतरता की कमी है और कट्स काफी अचानक महसूस होते हैं।

​सतही अदालती बहस: एक तकनीकी विषय पर आधारित कानूनी लड़ाई होने के बावजूद अदालती बहसें कई मौकों पर दोहराव भरी और सतही लगती हैं।

​कमजोर क्लाइमेक्स: इतने बड़े राष्ट्रीय संकट को उठाने के बाद फिल्म का अंत किसी ठोस नीतिगत बदलाव के बजाय केवल सरकारी ‘सलाह’ जैसे साधारण निर्देश पर समाप्त हो जाता है।

​वर्डिक्ट

​’द इंडिया स्टोरी’ ढीली पटकथा और कुछ नाटकीय दृश्यों के बावजूद समाज के एक बेहद गंभीर और अनदेखे पहलू पर रोशनी डालने का साहसिक प्रयास करती है। श्रेयस तलपड़े का बेहतरीन अभिनय और खाद्य सुरक्षा से जुड़े गंभीर तथ्य इसे एक बार देखने लायक बनाते हैं। यदि आप सामाजिक मुद्दों और गंभीर सिनेमा के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक सही विकल्प है।

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