दिल्ली में ब्रिक्स समिट: मोदी-पुतिन-शी की मुलाकात से अमेरिका को क्यों सता रही चिंता?
दिल्ली में ब्रिक्स समिट: मोदी-पुतिन-शी की मुलाकात से अमेरिका को क्यों सता रही चिंता?
नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026
भारत की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दोनों शामिल हो रहे हैं। पुतिन शुक्रवार (11 सितंबर) को पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात करेंगे, जबकि शी जिनपिंग शनिवार को आएंगे और मोदी से बातचीत करेंगे। सात साल बाद शी की यह भारत यात्रा है।
यह तीनों एशियाई महाशक्तियों का एक साथ दिल्ली में जुटना सिर्फ ब्रिक्स का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अमेरिका को रणनीतिक स्तर पर चिंता हो सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह जुटान?
भारत-चीन संबंधों में सुधार: 2020 के गलवान संघर्ष के बाद तनावपूर्ण रहे संबंधों में हाल के महीनों में राहत आई है। विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ताओं में सीमा प्रबंधन पर सहमति बनी है। शी की यात्रा और मोदी-शी द्विपक्षीय मुलाकात इसे और मजबूत कर सकती है।
भारत-रूस मजबूत साझेदारी: पुतिन-मोदी मुलाकात में रक्षा (Su-57 सहित), ऊर्जा, तेल आयात, व्यापार घाटा कम करने और स्थानीय मुद्रा में भुगतान जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। भारत रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है।
ब्रिक्स का विस्तारित स्वरूप: अब 11 सदस्य देशों वाला यह समूह मल्टीपोलर विश्व व्यवस्था, ग्लोबल साउथ की आवाज, वैकल्पिक भुगतान प्रणाली और डॉलर पर निर्भरता कम करने जैसे मुद्दों पर चर्चा करेगा।
अमेरिका को टेंशन क्यों?
अमेरिका ने लंबे समय से भारत को चीन के खिलाफ संतुलन बनाने वाले साझेदार के रूप में देखा है। अब भारत चीन के साथ तनाव कम कर रहा है और रूस के साथ रक्षा-ऊर्जा सहयोग जारी रखे हुए है। ब्रिक्स मंच पर ये तीनों एक साथ दिखना अमेरिका के लिए असुविधाजनक ऑप्टिक्स पैदा कर रहा है।
ट्रंप प्रशासन पहले भी ब्रिक्स की डॉलर-विकल्प वाली चर्चाओं पर नाराजगी जता चुका है और टैरिफ की धमकियां दी हैं। रूस पर सख्त प्रतिबंध, भारत-चीन पर टैरिफ दबाव और ईरान से जुड़े मुद्दों के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (किसी एक खेमे में न बंधना) अमेरिका के लिए चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी जरूरत, क्षमता और परिस्थितियों के हिसाब से चीन से लेकर अमेरिका तक दबाव बनाए रखता है। ब्रिक्स का यह मंच उसी संदेश को मजबूत कर रहा है।
भारत के लिए यह संतुलन साधने का मौका है। रूस से तेल और रक्षा सहयोग, चीन के साथ सीमा स्थिरता और व्यापार, तथा पश्चिम के साथ आर्थिक रिश्ते—तीनों दिशाओं में आगे बढ़ना दिल्ली की प्राथमिकता है। अमेरिका चाहे तो भारत के महत्व को और समझे, क्योंकि पाकिस्तान जैसे विकल्पों की तुलना में भारत का आर्थिक-कूटनीतिक वजन कहीं ज्यादा है।
सम्मेलन के दौरान मध्य पूर्व संकट (ईरान से जुड़े मुद्दे) और यूक्रेन युद्ध भी चर्चा में रह सकते हैं, जहां सदस्य देशों के बीच मतभेद भी हैं। फिर भी दिल्ली में तीनों नेताओं की उपस्थिति वैश्विक व्यवस्था में बदलाव के संकेत के रूप में देखी जा रही है।
अपडेट: चीनी विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर शी जिनपिंग की भागीदारी की पुष्टि कर दी है। पुतिन पहले से ही आ रहे हैं। दोनों नेताओं के साथ मोदी की अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें ब्रिक्स समिट का सबसे ज्यादा चर्चित हिस्सा होंगी।
