Wednesday, July 22, 2026
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राम मंदिर चढ़ावा चोरी और ‘बुलडोजर न्याय’ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस की तल्ख टिप्पणी: बोले- भ्रष्टाचार के लिए मौत की सजा पर हो विचार

राम मंदिर चढ़ावा चोरी और ‘बुलडोजर न्याय’ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस की तल्ख टिप्पणी: बोले- भ्रष्टाचार के लिए मौत की सजा पर हो विचार

​प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के हालिया मामले और राज्य में हो रही ‘बुलडोजर कार्रवाई’ पर बेहद कड़ी और भावुक टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला भारतीय समाज में ईमानदारी और नैतिकता के सबसे निचले स्तर को दर्शाता है।

​जस्टिस श्रीधरन ने चेतावनी दी कि भारत में भ्रष्टाचार इस हद तक जड़ जमा चुका है कि अब इसे रोकने के लिए ‘भ्रष्टाचार निरोधक कानून-1988’ में संशोधन कर दोषियों के लिए मृत्युदंड (मौत की सजा) का प्रावधान करने पर विचार किया जाना चाहिए।

​”क्या यह बात हमें शर्मिंदा नहीं करती?”

​जस्टिस श्रीधरन ने अपने 51 पन्नों के खंडित फैसले में भारत में सामान्य बन चुके भ्रष्टाचार पर गहरा दुख जताया। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

​भ्रष्टाचार को सामान्य मानना: उन्होंने कहा कि एक आम भारतीय ने भ्रष्टाचार को अपने जीवन का सामान्य हिस्सा मान लिया है। व्यक्ति तब तक खुद को गलत नहीं समझता जब तक वह पकड़ा न जाए।

​अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर सवाल: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है, लेकिन यह स्थिति भी हमारे समाज को शर्मिंदा नहीं करती।

​सब्र का बांध टूटा: राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी की घटना को उन्होंने समाज का ‘सब्र का बांध टूटने’ जैसा बताया। उन्होंने कहा कि जो लोग इस घटना से भी विचलित नहीं होते, वे किसी भी बात पर शर्मिंदा नहीं हो सकते।

​’बुलडोजर न्याय’ और अवैध निर्माण पर सख्त रुख

​उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की जा रही बुलडोजर कार्रवाइयों पर भी जस्टिस श्रीधरन ने कड़ा प्रहार किया:

​समाज की ‘खून की प्यास’: उन्होंने कहा कि किसी अपराध के तुरंत बाद आरोपी का मकान गिरा देना दरअसल उस समाज की ‘खून की प्यास’ को शांत करने का जरिया बन चुका है, जो ऐसे ‘बुलडोजर न्याय’ का आदी हो गया है।

​भ्रष्ट अधिकारियों की जवाबदेही: जस्टिस श्रीधरन ने स्पष्ट किया कि कोई भी इमारत या मकान रातों-रात बनकर खड़ा नहीं होता। राजनीतिक दबाव या रिश्वतखोरी के चलते नौकरशाही अवैध निर्माण पर आंखें मूंद लेती है। बेईमान अधिकारी बिल्डरों से पैसे लेकर निर्माण होने देते हैं और बाद में मासूम खरीदारों या नागरिकों को इसकी सजा भुगतनी पड़ती है।

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