उत्तराखंड: 30 जून को समाप्त हो जाएगा मदरसा बोर्ड, 1 जुलाई से अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण संभालेगा कमान
उत्तराखंड: 30 जून को समाप्त हो जाएगा मदरसा बोर्ड, 1 जुलाई से अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण संभालेगा कमान
देहरादून: उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था एक ऐतिहासिक और बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। राज्य में मदरसा शिक्षा बोर्ड का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। आगामी 30 जून 2026 को उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इसके ठीक अगले दिन, यानी 1 जुलाई से प्रदेश के सभी मदरसों की निगरानी, मान्यता, पाठ्यक्रम और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की कमान ‘राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण’ के हाथों में आ जाएगी।
इस बड़े बदलाव के बीच धामी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती मदरसों में पढ़ रहे हजारों बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने और कई मदरसा स्वामियों की असहमति के बीच उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की है।
आंकड़ों का फेरबदल: 452 पंजीकृत मदरसों में कितने छात्र?
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, राज्य में वर्तमान में 452 पंजीकृत मदरसे संचालित हैं, लेकिन इनमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या को लेकर असमंजस की स्थिति है:
अक्टूबर 2024 का दावा: मदरसा बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष ने पंजीकृत मदरसों में 70 हजार से अधिक छात्रों के होने का दावा किया था।
फरवरी 2026 की रिपोर्ट: सरकारी रिपोर्ट्स में यह संख्या घटकर लगभग 40 हजार से अधिक बताई गई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कितने मदरसे नई व्यवस्था और कड़े मानकों को पूरा करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, अल्पसंख्यक विभाग के अधिकारियों के मुताबिक कई संस्थानों ने प्राधिकरण से जुड़ने की आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया शुरू कर दी है, लेकिन कुछ अब भी संशय में हैं।
अपंजीकृत और अवैध मदरसों पर सबसे बड़ा सवाल
सरकार के सामने सबसे जटिल चुनौती उन लगभग 500 मदरसों को लेकर है, जो बिना किसी मान्यता या पंजीकरण के अवैध रूप से चलते पाए गए हैं। साल 2025-26 के दौरान सरकार ने इनके खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाया था, जिसमें पहले 136 और बाद में 170 संस्थानों को सील कर कानूनी कार्रवाई की गई थी। 1 जुलाई के बाद इन शेष अपंजीकृत संस्थानों पर क्या एक्शन होगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून पर विशेष नजर
उत्तराखंड के तराई और सीमावर्ती क्षेत्रों में मदरसों का घनत्व सबसे ज्यादा है। राज्य के तीन जिलों—हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून में सबसे अधिक मदरसा संख्या है। नई व्यवस्था और एनसीईआरटी (NCERT) पाठ्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रशासन इन तीन जिलों पर विशेष रूप से निगरानी रखने जा रहा है।
बुनियादी ढांचा और योग्य शिक्षकों की कमी बड़ी बाधा
धामी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि मदरसों को अब केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्हें आधुनिक शिक्षा के मानकों के अनुरूप ढालना होगा, जिसके तहत विज्ञान, गणित और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों को अनिवार्य किया जा रहा है। मगर जमीन पर इसके क्रियान्वयन में दो बड़ी चुनौतियां हैं:
शिक्षकों का अभाव: कई मदरसों में विज्ञान और गणित जैसे आधुनिक विषयों को पढ़ाने के लिए योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है।
संसाधनों की कमी: कई छोटे मदरसे बेहद सीमित संसाधनों में चल रहे हैं। प्राधिकरण के लिए यह देखना चुनौतीपूर्ण होगा कि कितने मदरसों के पास पर्याप्त कक्षाएं, पुस्तकालय और विज्ञान प्रयोगशालाएं (लैब्स) उपलब्ध हैं।
अधिकारियों का दावा: छात्रों के भविष्य से नहीं होगा समझौता
इस बड़े बदलाव को लेकर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के उच्च अधिकारियों ने अपनी तैयारी पूरी होने का दावा किया है:
”मदरसा बोर्ड भंग होने से पहले ही सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मदरसों के पास रजिस्ट्रेशन के लिए पर्याप्त समय मौजूद है।”
— पराग मधुकर, विशेष सचिव, अल्पसंख्यक विभाग
”किसी भी बच्चे के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं होगा। जिस तरह से तैयारी की गई है, वह मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखकर ही ली गई है। रजिस्ट्रेशन को लेकर भी तेजी से काम किया जा रहा है।”
— दीप्ति सिंह, निदेशक, अल्पसंख्यक विभाग
निष्कर्ष: 1 जुलाई से शुरू होगा नया अध्याय
30 जून के बाद उत्तराखंड मदरसा बोर्ड हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। इसके बाद राज्य की पूरी मदरसा शिक्षा पद्धति बदल जाएगी। यदि सरकार आधुनिक शिक्षकों की व्यवस्था और सुचारू पंजीकरण कराने में सफल रहती है, तो यह प्रयोग मील का पत्थर साबित होगा। बहरहाल, 1 जुलाई से शुरू होने वाली प्राधिकरण की इस परीक्षा और शिक्षा सुधार के इस नए अध्याय पर पूरे उत्तराखंड की निगाहें टिकी हुई हैं।
