Monday, June 15, 2026
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टीएमसी के 20 बागियों का सहारा बनी गुमनाम ‘NCPI’; जानिए क्या है इस पार्टी का त्रिपुरा कनेक्शन और पश्चिम बंगाल से नाता

टीएमसी के 20 बागियों का सहारा बनी गुमनाम ‘NCPI’; जानिए क्या है इस पार्टी का त्रिपुरा कनेक्शन और पश्चिम बंगाल से नाता

विशेष राजनीतिक डेस्क

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुई ऐतिहासिक बगावत ने देश की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने विलय की घोषणा की है। इस चौंकाने वाले घटनाक्रम के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि आखिर यह गुमनाम पार्टी कौन सी है, इसका वजूद कहाँ है और टीएमसी के दिग्गज बागी सांसदों ने इसी दल को क्यों चुना? चुनाव आयोग के रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों से इस पार्टी को लेकर कई बड़ी जानकारियां सामने आई हैं।

​चुनाव आयोग में दर्ज है NCPI का रिकॉर्ड; त्रिपुरा से लड़ा था चुनाव

​’नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) कोई गैर-पंजीकृत दल नहीं है, बल्कि यह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के रिकॉर्ड में बकायदा दर्ज है। इस पार्टी का गठन साल 2023 में हुआ था। चुनाव आयोग की ऑडिट रिपोर्ट और डोनेशन रिकॉर्ड के मुताबिक, पार्टी ने अपने सभी वित्तीय दस्तावेज समय पर आयोग के समक्ष पेश किए थे।

​साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने इस पार्टी को ‘सात किरणों वाली पेन की निब’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था। जमीनी स्तर पर पार्टी का वजूद बेहद सीमित रहा है। 2023 के त्रिपुरा चुनाव में पार्टी ने तीन सीटों— चावमानु, कैलाशहर और अंबासा पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।

​पार्टी का वोट बैंक इतना सीमित था कि किसी भी उम्मीदवार को 550 वोट भी नसीब नहीं हुए। चावमानु सीट पर 536 वोट, कैलाशहर में 286 वोट और अंबासा सीट पर पार्टी को मात्र 376 वोट मिले थे। पार्टी को मिले कुल 1,198 वोटों के साथ इसके सभी उम्मीदवार अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाए थे। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, त्रिपुरा चुनाव के दौरान पार्टी को कुल 1 लाख 13 हजार रुपये का चंदा (डोनेशन) मिला था, जिससे चुनाव लड़ने की जानकारी आयोग को दी गई थी।

​कौन हैं पार्टी अध्यक्ष उत्तिया कुंडू? भाजपा से नजदीकी की चर्चा

​NCPI के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम उत्तिया कुंडू है, जो मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं। हाल ही में 10 मई 2026 को उनकी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई, जिसमें वे पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्यमंत्री शुवेंदू अधिकारी के साथ नजर आ रहे हैं।

​इसके अलावा, उत्तिया कुंडू अपने सोशल मीडिया पेजों से टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर तीखे राजनीतिक हमले बोलते रहे हैं, जिससे यह साफ है कि वे राजनीतिक रूप से टीएमसी के धुर विरोधी हैं। इस वजह से राजनीतिक हलकों में उनकी भाजपा (BJP) से नजदीकी को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं।

​पार्टी में उनकी पत्नी शेवली कुंडू भी शामिल हैं, जो NCPI की कोषाध्यक्ष हैं। शेवली कुंडू पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर इलाके की रहने वाली हैं और ‘बिस्वाबाजार प्राइवेट लिमिटेड’ व ‘महिला कर्मी एसोसिएशन’ नामक दो संगठनों की डायरेक्टर भी हैं।

​पार्टी नेताओं ने ही जताई हैरानी; चुनाव के बाद ठप था कामकाज

​पार्टी के महासचिव रहे शांतनु डे ने मीडिया (NDTV) से बातचीत में बताया कि 2023 का त्रिपुरा चुनाव उन्होंने मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों के हक के लिए लड़ा था। पहले 7 सीटों पर लड़ने की तैयारी थी, लेकिन अंत में केवल तीन सीटों पर ही प्रत्याशी उतारे जा सके। शांतनु डे ने यह भी खुलासा किया कि 2023 में पार्टी ने बंगाल में पंचायत चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी, लेकिन पैसों को लेकर हुए अंदरूनी विवाद के कारण कामकाज पूरी तरह ठप हो गया था। उन्हें साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए भी कहा गया था, लेकिन वह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

​दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के पूर्व उम्मीदवार रहे जहांगीर अली और बरजेदा त्रिपुरा ने इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर भारी हैरानी जताई है। उनका कहना है कि 2023 के चुनाव के बाद से पार्टी नेतृत्व (शेवली कुंडू) ने उनसे कोई संपर्क नहीं किया और वे पूरी तरह से संपर्क से बाहर थे।

​बागी सांसदों ने ओम बिरला से की मुलाकात; एनडीए को समर्थन का एलान

​टीएमसी के बागी सांसदों का नेतृत्व कर रहे सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष ने रविवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की है। इस मुलाकात की तस्वीरें भी सामने आई हैं। बागी गुट ने लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपकर संसद में अलग संसदीय समूह (Separate Parliamentary Group) के तौर पर मान्यता देने और अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है। सुदीप बंद्योपाध्याय ने स्पष्ट किया है कि वे संसद में NCPI पार्टी के तौर पर अलग ब्लॉक बनाकर बैठेंगे और केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) सरकार का समर्थन करेंगे। अब इस पर स्पीकर ओम बिरला के आधिकारिक फैसले का इंतजार है।

​आखिर बगावत के लिए NCPI को ही क्यों चुना गया? (कानूनी मजबूरी)

​टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा इस गुमनाम पार्टी में विलय करने के पीछे एक बहुत बड़ा रणनीतिक और संवैधानिक कारण है।

​संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के मुताबिक, यदि कोई सांसद अपनी मूल पार्टी छोड़ता है, तो उसकी संसद सदस्यता रद्द हो सकती है। हालांकि, नियम यह भी कहता है कि यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक किसी दूसरी पंजीकृत पार्टी में अपनी मूल पार्टी का ‘विलय’ (Merge) कर लेते हैं, तो उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है।

​लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। बागी गुट ने अपने साथ 20 सांसदों के होने का दावा किया है, जो कि दो-तिहाई के आंकड़े (19 सांसद) से ज्यादा है। चूंकि संसद के नियमों के मुताबिक कोई भी बागी धड़ा सदन के भीतर अपना कोई स्वतंत्र गुट या नया ब्लॉक नहीं बना सकता, इसलिए सांसदों ने अपनी सदस्यता बचाने और एनडीए को समर्थन देने के लिए चुनाव आयोग में पहले से रजिस्टर्ड दल NCPI में विलय का कानूनी रास्ता चुना है।

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