भारत में ऑटोोनोमस ड्राइविंग की ओर बड़ा कदम: केंद्र सरकार ने हटाई राडार सेंसर के लिए लाइसेंस की पाबंदी
भारत में ऑटोोनोमस ड्राइविंग की ओर बड़ा कदम: केंद्र सरकार ने हटाई राडार सेंसर के लिए लाइसेंस की पाबंदी
नई दिल्ली:
भारत में बिना ड्राइवर वाली यानी सेल्फ-ड्राइविंग कारों (Autonomous Vehicles) और एडवांस्ड ड्राइविंग सेफ्टी फीचर्स (ADAS) का रास्ता साफ करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बेहद ऐतिहासिक फैसला लिया है। सरकार ने ऑटोमोटिव राडार सेंसर और व्हीकल-टू-एवरीथिंग (V2X) कनेक्टिविटी के लिए इस्तेमाल होने वाले फ्रीक्वेंसी बैंड्स को पूरी तरह से डी-लाइसेंस (लाइसेंस मुक्त) कर दिया है। इस कदम के बाद कार निर्माता कंपनियों को अब वाहनों में एडवांस सेफ्टी सेंसर्स लगाने के लिए सरकार से अलग से स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट की मंजूरी नहीं लेनी होगी।
किन फ्रीक्वेंसी को किया गया लाइसेंस-मुक्त?
दूरसंचार विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, कारों की सुरक्षा और ऑटोोनोमस ड्राइविंग के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले दो मुख्य फ्रीक्वेंसी बैंड्स को अब छूट दे दी गई है:
77-81 GHz बैंड: यह फ्रीक्वेंसी बैंड मुख्य रूप से ऑटोमोटिव राडार सेंसर के लिए इस्तेमाल होता है। इसके जरिए कारें अपने आस-पास की वस्तुओं, गाड़ियों और इंसानों को डिटेक्ट करती हैं।
5.9 GHz बैंड: इस फ्रीक्वेंसी का उपयोग व्हीकल-टू-एवरीथिंग (V2X) कम्युनिकेशन के लिए होता है, जिससे गाड़ियां सड़क पर मौजूद अन्य वाहनों और इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे ट्रैफिक सिग्नल) से रियल-टाइम डेटा एक्सचेंज कर सकती हैं।
क्या बिना लाइसेंस के चलेंगी गाड़ियां? (भ्रम का निवारण)
सोशल मीडिया और इंटरनेट पर ‘लाइसेंस का झंझट खत्म’ जैसी खबरों को लेकर कुछ भ्रम देखा जा रहा है। यहां यह साफ करना जरूरी है कि सरकार ने इंसानों के लिए ‘ड्राइविंग लाइसेंस’ खत्म नहीं किया है। बल्कि, कार कंपनियों के लिए उन सेंसर्स और वायरलेस टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने का ‘स्पेक्ट्रम लाइसेंस’ हटाया है जो कार को खुद चलने या एक्सीडेंट से बचाने में सक्षम बनाते हैं।
सड़क हादसों में कमी लाने की बड़ी कोशिश
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है, लेकिन यहां सड़क हादसों में होने वाली मौतें एक गंभीर चिंता का विषय हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल पौने दो लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। राडार सेंसर्स पर से पाबंदी हटने के बाद कारों में ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) जैसे फीचर्स बेहद सस्ते और सुलभ हो जाएंगे। इसके तहत:
ऑटोोनोमस इमरजेंसी ब्रेकिंग (AEB): अचानक सामने कोई रुकावट आने पर कार खुद ब्रेक लगा लेगी।
एडैप्टिव क्रूज कंट्रोल: कार आगे चल रही गाड़ी से निश्चित दूरी बनाए रखते हुए खुद अपनी स्पीड तय करेगी।
ब्लाइंड स्पॉट डिटेक्शन: पीछे या साइड से आ रहे वाहनों की सटीक जानकारी ड्राइवर को सेंसर के जरिए मिलेगी।
घरेलू और वैश्विक कंपनियों को मिलेगा सीधा फायदा
इस नीतिगत बदलाव के बाद भारत का नियम अब अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के वैश्विक मानकों के बराबर आ गया है। इससे मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू जैसी वैश्विक लग्जरी कंपनियों को अपने अंतरराष्ट्रीय मॉडल्स को सीधे भारत लाने में आसानी होगी। वहीं दूसरी ओर, भारत की घरेलू दिग्गज कंपनियां जैसे मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा भी अब अपनी बजट और मिड-रेंज कारों में बिना किसी कानूनी अड़चन के अंतरराष्ट्रीय स्तर की राडार और सेफ्टी तकनीक दे सकेंगी।
रोजगार और पूर्ण ऑटोनॉमी पर सरकार का रुख:
हालांकि सरकार ने तकनीक के लिए रास्ते खोल दिए हैं, लेकिन केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पहले भी कई बार स्पष्ट किया है कि भारत में पूरी तरह से ‘ड्राइवरलेस’ (बिना ड्राइवर वाली) कारों को व्यावसायिक रूप से अनुमति देना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इससे देश के लाखों ड्राइवरों के रोजगार पर सीधा असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत सरकार का फोकस फिलहाल ‘ड्राइवरलेस’ से ज्यादा ‘ड्राइवर-असिस्टेंस और सेफ्टी’ तकनीक को बढ़ावा देने पर है।
