गैर-विधायक को दोबारा मंत्री बनाने का विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट; बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी, CJI ने पूछा— ‘क्या वो अब भी पद पर हैं?’
गैर-विधायक को दोबारा मंत्री बनाने का विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट; बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी, CJI ने पूछा— ‘क्या वो अब भी पद पर हैं?’
नई दिल्ली/पटना: बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए बिहार सरकार, पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सबसे पहले मंत्री की वर्तमान स्थिति जाननी चाही। सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा, “क्या वह अभी भी मंत्री पद पर हैं?” इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने सकारात्मक जवाब देते हुए कहा कि हां, वे वर्तमान में भी मंत्री पद पर बने हुए हैं। इसके तुरंत बाद शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को नोटिस जारी कर दिया और अगली सुनवाई 15 जुलाई तय की है।
क्या है पूरा विवाद और 6 महीने की समय-सीमा?
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर इस याचिका में बिहार सरकार के इस कदम को पूरी तरह असंवैधानिक बताया गया है।
पहली नियुक्ति: दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली कैबिनेट में मंत्री बनाया गया था, जबकि वे न तो विधानसभा (MLA) और न ही विधान परिषद (MLC) के सदस्य थे।
6 महीने की अवधि: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत किसी भी गैर-विधायक व्यक्ति को अधिकतम 6 महीने के लिए मंत्री बनाया जा सकता है, जिसके भीतर उसे किसी भी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है। इस लिहाज से दीपक प्रकाश के लिए यह समय-सीमा 20 मई 2026 को समाप्त हो गई थी।
इस्तीफा और दोबारा नियुक्ति: इस बीच 15 अप्रैल को सरकार बदलने/dissolve होने के बाद 22 दिनों का एक गैप आया। इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार में दीपक प्रकाश को बिना चुनाव जीते दोबारा पंचायती राज मंत्री पद की शपथ दिला दी गई।
’संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़’: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों (जैसे एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य) का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 164(4) के तहत मिलने वाली 6 महीने की छूट केवल एक बार के लिए एक ‘अस्थायी रियायत’ होती है। इसे किसी भी विधानसभा के कार्यकाल के दौरान इस्तीफा देकर, सरकार बदलकर या फेरबदल के जरिए दोबारा ‘रीसेट’ (शून्य) नहीं किया जा सकता।
याचिका में दावा किया गया है कि सरकार ने केवल एक व्यक्ति को अतिरिक्त समय देने के लिए इस संवैधानिक प्रावधान का दुरुपयोग किया है, जो कि पूरी तरह से ‘कलरएबल एक्सरसाइज ऑफ पावर’ (शक्तियों का अनुचित उपयोग) है।
संसदीय लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में स्पष्ट किया गया है कि यह मामला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इससे हमारे देश के व्यापक संवैधानिक ढांचे से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
संवैधानिक शासन: क्या कोई सरकार बिना लोकतांत्रिक जनादेश के किसी व्यक्ति को बार-बार मंत्री पद पर बनाए रख सकती है?
जवाबदेही: यह कदम मंत्रिपरिषद की सामूहिक जवाबदेही और कार्यपालिका की शक्तियों की संवैधानिक सीमाओं को दरकिनार करता है।
संसदीय लोकतंत्र: अगर इस तरह की पुनर्नियुक्तियों को बढ़ावा मिला, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही और प्रतिनिधि सरकार के सिद्धांतों को पूरी तरह कमजोर कर देगा।
याचिकाकर्ता ने अदालत से इस मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभाव से अंतरिम आदेश जारी करने और दीपक प्रकाश को मंत्री के रूप में कार्य करने से रोकने (Writ of Quo Warranto) की अपील की है। अब सभी की नजरें 15 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
