अमेरिका-ईरान में शांति समझौते की कवायद तेज: ईरानी विदेश मंत्री बोले— ‘डील बेहद करीब’, लेकिन इन 5 बड़े मुद्दों पर फंसा है पेंच
अमेरिका-ईरान में शांति समझौते की कवायद तेज: ईरानी विदेश मंत्री बोले— ‘डील बेहद करीब’, लेकिन इन 5 बड़े मुद्दों पर फंसा है पेंच
तेहरान/वाशिंगटन
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी तनाव और युद्ध की स्थिति को खत्म करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर सहमति बनती दिख रही है। ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची ने आधिकारिक पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच युद्ध को समाप्त करने के लिए एक डील पर लगभग सहमति बन गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस पोस्ट को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर री-पोस्ट किया है, जिससे इस डील को लेकर गंभीरता बढ़ गई है।
ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने सोशल मीडिया पर लिखा:
”इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पहले कभी सफलता के इतने करीब नहीं था। जब तक यह पूरी तरह फाइनल नहीं हो जाता, तब तक मीडिया को इसके कंटेंट के बारे में अंदाजा लगाने और अटकलें लगाने से बचना चाहिए। हमारे जिम्मेदार और पारदर्शी नजरिए के मुताबिक, सभी विवरण सही समय पर जनता के साथ साझा किए जाएंगे।”
भले ही दोनों पक्ष इस समझौते को बहुत करीब बता रहे हैं, लेकिन अमेरिकी मीडिया नेटवर्क सीएनएन (CNN) ने समझौते में शामिल एक राजनयिक, ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और ईरानी मीडिया के हवाले से रिपोर्ट दी है कि 5 बड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेदों की खाई अब भी बेहद गहरी है।
1. होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) का बॉस कौन होगा?
दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग को लेकर धुंध अभी भी बरकरार है:
अमेरिकी पक्ष: अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, स्ट्रेट को फिर से खोल दिया जाएगा। एक राजनयिक ने बताया कि ईरान को इस मार्ग से ट्रांजिट फीस (टैक्स) वसूलने की इजाजत नहीं होगी। हालांकि, यह साफ नहीं है कि इस समुद्री ट्रैफिक की देखरेख और नियंत्रण किसके हाथ में होगा।
ईरानी पक्ष: ईरानी मीडिया ने इस समझौते में किसी भी तरह की फीस का कोई जिक्र नहीं किया है, जिससे संकेत मिलते हैं कि तेहरान ने शायद यह मांग छोड़ दी है।
2. फ्रीज फंड (24 बिलियन डॉलर) को लेकर विरोधाभास
ईरान के अरबों डॉलर के फ्रीज पड़े फंड को लेकर दोनों पक्षों के दावों में जमीन-आसमान का अंतर है:
राजनयिक का दावा: ईरान की वह मांग समझौते के मसौदे से पूरी तरह गायब है, जिसमें वह अमेरिका द्वारा ब्लॉक किए गए अपने अरबों डॉलर के फंड को अनफ्रीज करने की बात कर रहा था।
अमेरिकी अधिकारी की चेतावनी: एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने साफ किया कि जब तक ईरान अपना काम (शर्तें) पूरा नहीं कर देता, तब तक उसका कोई भी पैसा रिलीज नहीं किया जाएगा।
ईरानी मीडिया का दावा: इसके ठीक उलट, ईरानी मीडिया का कहना है कि इस डील के तहत 24 बिलियन डॉलर रिलीज किए जाएंगे, जिसमें से आधी रकम (12 बिलियन डॉलर) समझौता साइन करते ही तुरंत ईरान को मिल जाएगी।
3. युद्ध का मुआवजा: $300 बिलियन का रिकंस्ट्रक्शन फंड
युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई को लेकर भी संकट के बादल हैं:
ईरानी मीडिया लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि समझौते में 300 बिलियन डॉलर का रिकंस्ट्रक्शन फंड शामिल है, जिसे युद्ध के नुकसान के मुआवजे के तौर पर दिया जा रहा है।
अमेरिकी अधिकारी और राजनयिक ऐसे किसी भी प्रावधान या फंड का जिक्र करने से पूरी तरह बच रहे हैं।
4. इजरायल, लेबनान और हिज्बुल्लाह का अनसुलझा मुद्दा
भले ही इजरायल और हिज्बुल्लाह इस बातचीत की मेज पर सीधे तौर पर शामिल नहीं हैं, लेकिन सीएनएन के सूत्रों के मुताबिक, ड्राफ्ट में ऐसे कमिटमेंट (प्रतिबद्धताएं) शामिल हैं जो दोनों पक्षों पर सीधा असर डालते हैं:
इस अरेंजमेंट के तहत लेबनान में भी सीजफायर (युद्धविराम) शामिल है।
अब यह वाशिंगटन और तेहरान पर निर्भर करता है कि वे अपने-अपने पार्टनर्स (अमेरिका इजरायल पर और ईरान हिज्बुल्लाह पर) से इसका पालन करवाएं। हालांकि, इजरायल ने बार-बार दोहराया है कि वह हिज्बुल्लाह पर अपने हमले जारी रखेगा।
5. न्यूक्लियर स्टॉक और यूरेनियम को लेकर असमंजस
परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी दोनों पक्षों के बयानों में भारी विरोधाभास है:
ट्रंप प्रशासन का दावा: अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा और उसके न्यूक्लियर मटेरियल को नष्ट करके हटा दिया जाएगा। राजनयिक ने भी कहा कि यह समझौता ईरान के हाईली एनरिच्ड यूरेनियम (अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम) के स्टॉक समेत अमेरिका की सभी चिंताओं को पूरा करता है।
ईरानी मीडिया का दावा: इसके विपरीत, ईरानी मीडिया का कहना है कि ईरान तुरंत कोई नया वादा नहीं करेगा। मेमो पर साइन करने के बाद मिलने वाले 60 दिनों के बफर टाइम में ही परमाणु मुद्दे पर आगे बातचीत की जाएगी।
निष्कर्ष:
इन विरोधाभासों को देखकर यह स्पष्ट है कि भले ही राजनयिक स्तर पर ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ को ऐतिहासिक कामयाबी बताया जा रहा हो, लेकिन धरातल पर दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी एक बड़ी रुकावट बने हुए हैं।
