पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उबाल: एक महीने के ‘पब्लिक लॉकडाउन’ का ऐलान, चुनाव से पहले सियासी माहौल गर्म
पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उबाल: एक महीने के ‘पब्लिक लॉकडाउन’ का ऐलान, चुनाव से पहले सियासी माहौल गर्म
मुज़फ़्फ़राबाद/गिलगित। पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) और गिलगित-बाल्टिस्तान (GB) में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी, बेकाबू महंगाई और राजनीतिक अधिकारों के दमन को लेकर स्थानीय जनता का असंतोष अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। विभिन्न स्थानीय नागरिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं के आह्वान पर कई प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, पीओके की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद समेत रावलाकोट, कोटली और मीरपुर जैसे इलाकों में लोग सड़कों पर उतरकर प्रशासन और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रहे हैं।
आटे-राशन और बिजली के लिए तरस रही जनता
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस पूरे क्षेत्र में महंगाई, बेरोजगारी, बदहाल सड़कें, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का अभाव जैसी बुनियादी समस्याएं लंबे समय से जस की तस बनी हुई हैं। सबसे ज्यादा नाराजगी सरकारी राशन वितरण व्यवस्था को लेकर है, जहां लोगों को बुनियादी खाद्य वस्तुओं और आटे के लिए भी घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है。 क्षेत्र में बिजली का गंभीर संकट भी बना हुआ है, जिसके कारण आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है।
9 जून से एक महीने का ‘पब्लिक लॉकडाउन’ और चक्का जाम
बिगड़ते हालात के बीच पीओके के विभिन्न नागरिक और व्यापारिक संगठनों के संयुक्त मंच ‘ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) ने 9 जून से पूरे क्षेत्र में एक महीने के अनिश्चितकालीन ‘पब्लिक लॉकडाउन’ और ‘व्हील-जाम’ (चक्का जाम) हड़ताल का ऐलान कर दिया है।
कमेटी के केंद्रीय नेता शौकत नवाज मीर ने जनता से अपील की है कि वे इस ऐतिहासिक आंदोलन के मद्देनजर अपनी जरूरत का राशन और आवश्यक सामान पहले से ही जमा कर लें। मीर ने पाकिस्तान सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा:
”यह आंदोलन केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि हमारे खोए हुए अधिकारों और क्षेत्र के विकास की लड़ाई है। पीओके के लोगों के साथ दशकों से जो अन्याय और शोषण हो रहा है, अब उसके खिलाफ जनता चुप नहीं बैठेगी।”
संघीय मंत्रियों (राणा सनाउल्लाह, अहसान इकबाल) और जेएएसी के नेताओं के बीच हुई मैराथन बातचीत बेनतीजा रही, जिसके बाद कमेटी ने हड़ताल पर आगे बढ़ने का फैसला अडिग रखा है। मुख्य विवाद शरणार्थी सीटों (Refugee Seats) को खत्म करने और संवैधानिक सुधारों को लेकर अटका हुआ है।
गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव से पहले हलचल तेज
दूसरी तरफ, गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून को होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां अपने चरम पर हैं। ज्ञात हो कि नवंबर 2025 में पिछली सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद वहां एक अंतरिम (केयरटेकर) सरकार का गठन किया गया था। शुरुआत में मौसम की खराबी के कारण टाले गए ये चुनाव अब करीब 7 महीने के अंतराल के बाद आयोजित हो रहे हैं, जिससे पूरा चुनावी माहौल गरमाया हुआ है। विपक्ष और स्थानीय समूहों ने आरोप लगाया है कि इस चुनावी प्रक्रिया पर हमेशा की तरह पाकिस्तानी सत्ता और वहां की सेना का सीधा प्रभाव और दबाव बना हुआ है।
नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो ने उठाए विकास पर सवाल
चुनावी रैलियों और प्रचार के सिलसिले में गिलगित पहुंचे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने वहां की बदहाली पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि गिलगित की टूटी सड़कें और बुनियादी ढांचे की दयनीय स्थिति देखकर उन्हें बेहद दुख हुआ है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए सवाल किया कि आखिर विकास के नाम पर आवंटित होने वाला भारी-भरकम फंड कहां गायब हो गया।
वहीं, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने भी रैली के दौरान क्षेत्र के अधिकारों की बात की। उन्होंने कहा कि गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता को उनके प्राकृतिक संसाधनों में उचित हिस्सेदारी और राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिए, जो लंबे समय से उन्हें नहीं दिए गए हैं।
मतदाता सूचियों में धांधली के आरोप
स्थानीय कश्मीरी और बाल्टी नेताओं ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि जानबूझकर मतदाता सूचियों (Voter Lists) में भारी अनियमितताएं और गड़बड़ी की गई है ताकि नतीजों को प्रभावित किया जा सके। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की मांग की है।
वर्तमान में, 9 जून से होने वाले पूर्ण लॉकडाउन और 7 जून के चुनावों को देखते हुए पूरा क्षेत्र एक राजनीतिक बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है। अब देखना यह होगा कि इस भारी जन-आक्रोश के सामने इस्लामाबाद की सरकार क्या रुख अपनाती है।
