बंगाल की राजनीति में महाभूकंप: नतीजों के 1 महीने के भीतर दोफाड़ हुई TMC, ‘दीदी’ के गढ़ में ऐतिहासिक बिखराव
बंगाल की राजनीति में महाभूकंप: नतीजों के 1 महीने के भीतर दोफाड़ हुई TMC, ‘दीदी’ के गढ़ में ऐतिहासिक बिखराव
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सियासत में आज से ठीक एक महीने पहले आए चुनावी तूफान के बाद अब एक ऐसा राजनीतिक बवंडर उठा है, जिसने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी है। डेढ़ दशक तक बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के महज एक महीने के भीतर ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है। जो पार्टी खुद को बंगाल का सबसे मजबूत और अटूट संगठन मानती थी, वह आज अंदरूनी बगावत, फर्जी हस्ताक्षर विवाद और विधायकों की पाला-बदली के कारण दो धड़ों में बंट चुकी है। 28 साल 5 महीने पुरानी इस पार्टी के अस्तित्व पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है।
आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि 4 मई से 3 जून 2026 के बीच ऐसा क्या हुआ, जिसने ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ वाली टीएमसी को बिखराव की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया:
हार से लेकर बगावत तक: तारीख-दर-तारीख पूरा घटनाक्रम
04 मई (नतीजों का दिन): विधानसभा चुनाव के नतीजों में टीएमसी को करारी हार का सामना करना पड़ा। ममता बनर्जी की पार्टी महज 80 सीटों पर सिमट गई, जबकि बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया (बाद में फाल्टा उपचुनाव जीतकर बीजेपी का आंकड़ा 208 पहुंच गया)। 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी द्वारा बनाई गई पार्टी के पैर यहीं से उखड़ने शुरू हुए।
06 मई (नाराजगी की शुरुआत): चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी ने कालिघाट स्थित अपने दफ्तर में जीते हुए विधायकों की बैठक बुलाई। बैठक में ममता ने सभी विधायकों को खड़े होकर अभिषेक बनर्जी के सम्मान में तालियां बजाने का निर्देश दिया। यहीं से वरिष्ठ नेताओं और विधायकों के भीतर नाराजगी का गुबार फूट पड़ा।
22 मई (गुप्त मुलाकात): दिल्ली के बंग भवन में नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और टीएमसी विधायक ऋतब्रत के बीच एक ‘अनपेक्षित’ मुलाकात हुई, जिसने टीएमसी खेमे में खलबली मचा दी। इस बीच काकोली घोष दस्तीदार और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय जैसे वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी लाइन के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया था।
25 से 27 मई (फर्जी हस्ताक्षर विवाद और CID जांच): टीएमसी में असली विवाद तब शुरू हुआ जब विधानसभा में विपक्ष के नेता के प्रस्ताव से जुड़े दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षर के आरोप लगे। विधायक ऋतब्रत और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर इसकी शिकायत की, जिसके बाद हेयर स्ट्रीट थाने में मामला दर्ज हुआ और सीआईडी (CID) ने जांच शुरू कर दी।
30 मई (अभिषेक बनर्जी पर हमला): सोनारपुर दौरे के दौरान टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को स्थानीय लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उनके साथ धक्का-मुक्की की गई, अंडे और पत्थर फेंके गए, जिसमें उनकी शर्ट और फिटनेस बैंड भी टूट गया।
31 मई (बैठक रद्द और होटल पॉलिटिक्स): बगावत का असर तब साफ दिखा जब ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई विजयी विधायकों की बैठक में 80 में से सिर्फ 20 विधायक पहुंचे और बैठक रद्द करनी पड़ी। इसी दिन शाम को कम से कम 50 बागी विधायक कोलकाता के एक फाइव स्टार होटल में एकजुट हुए।
01 जून (नेताओं का निष्कासन): मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फर्जी हस्ताक्षर मामले में सीआईडी जांच की बात उठाई। इसके ठीक 15 मिनट बाद टीएमसी ने बागी रुख अपना रहे ऋतब्रत और संदीपन साहा को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया।
03 जून (TMC में ऐतिहासिक टूट): सुबह 10 बजे ऋतब्रत और संदीपन के गुट ने 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र स्पीकर को सौंपा, जिसमें ऋतब्रत को सर्वसम्मति से विपक्ष का नेता स्वीकार किया गया। इस पत्र के साथ ही टीएमसी के 80 में से 58 विधायक अलग हो गए और पार्टी दो धड़ों में विभाजित हो गई।
बागी गुट का नया ढांचा
विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र के अनुसार, बागी गुट ने सदन के भीतर अपना नया नेतृत्व तय कर लिया है:
विपक्ष के नेता: ऋतब्रत
उपनेता: जावेद खान, सबीना यास्मीन, संदीपन साहा और शिउली साहा
चीफ व्हिप: अखरुज्जमान
’दीदी’ का पलटवार: क्या यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का अंत है?
इस ऐतिहासिक टूट और बड़े झटके के बाद भी ममता बनर्जी बैकफुट पर जाने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने बीजेपी पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग, पैसों के लेन-देन और धमकियों के जरिए पार्टी तोड़ने का सीधा आरोप लगाया है।
”मैं पश्चिम बंगाल में बीजेपी को सत्ता से हटाकर रहूंगी।”
— ममता बनर्जी (2 जून, धरने के दौरान)
संकट से निपटने के लिए ममता बनर्जी ने बड़ा कदम उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियों और संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। पार्टी अब जमीनी स्तर पर अपना आत्ममूल्यांकन कर रही है, जिसके बाद संगठन के नए सिरे से पुनर्गठन की घोषणा की जाएगी।
अंतिम विश्लेषण:
ममता बनर्जी भारतीय राजनीति की सबसे जुझारू और जन आंदोलनों से उभरी नेताओं में गिनी जाती हैं। पश्चिम बंगाल की जमीनी नब्ज पर उनकी पकड़ आज भी मजबूत है। इतिहास गवाह है कि उन्होंने हर बड़ी चुनौती का डटकर सामना किया है। इसलिए, टीएमसी के भीतर आए इस आंतरिक संकट और बिखराव को उनके राजनीतिक अध्याय का अंत मान लेना बहुत बड़ी जल्दबाजी होगी। ‘दीदी’ के इस नए संघर्ष पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
