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मूवी रिव्यू: ‘पेड्डी’ दिमाग को दें आराम और दिल से महसूस करें राम चरण का ये जज्बाती खेल

मूवी रिव्यू: ‘पेड्डी’ – दिमाग को दें आराम और दिल से महसूस करें राम चरण का ये जज्बाती खेल

​फिल्म: पेड्डी (Peddi)

निर्देशक: बुची बाबू साना

मुख्य कलाकार: राम चरण, जाह्नवी कपूर, शिव राजकुमार, जगपति बाबू, बोमन ईरानी, दिव्येंदु

शैली: स्पोर्ट्स इमोशनल ड्रामा

स्टार रेटिंग: 3.5/5

बॉलीवुड हो या साउथ फिल्म इंडस्ट्री, जब भी कोई बड़ी पैन-इंडिया फिल्म रिलीज होती है तो उसके साथ उम्मीदों का भारी-भरकम बोझ जुड़ जाता है। बार-बार टलने, सोशल मीडिया पर लीक होते प्लॉट और फैंस की लंबी बेसब्री के बाद मेगा पावर स्टार राम चरण की बहु-प्रतीक्षित फिल्म ‘पेड्डी’ आखिरकार सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। आमतौर पर कमर्शियल सिनेमा में लार्जर देन लाइफ इमेज को चमकाने की होड़ रहती है, लेकिन निर्देशक बुची बाबू साना ने एक बिल्कुल अलग राह चुनी है। ‘पेड्डी’ एक ऐसा विरोधाभास पैदा करती है जो दर्शकों को सेलिब्रेट करने का मौका तो देती ही है, साथ ही कुछ सिनेमाई मंथन भी छोड़ जाती है। कुल मिलाकर यह दिमाग से ज्यादा सीधे दिल पर चोट करने वाली फिल्म है।

​क्या है कहानी?

​फिल्म की कहानी किसी चकाचौंध से भरे महानगर की नहीं, बल्कि पहाड़ों के बीच बसे एक ऐसे गुमनाम गांव की है, जिसका देश के नक्शे और सरकारी कागजों पर कोई वजूद नहीं है। इस बेनाम गांव के १५०० लोगों के पास न तो बुनियादी सुविधाएं हैं और न ही वोट देने का अधिकार। इन ग्रामीणों की बस एक ही जिद है—उनके गांव में एक रेलवे स्टेशन बने, जिसे वे केवल यातायात के साधन के रूप में नहीं, बल्कि अपनी नागरिकता और वजूद के सबसे बड़े सबूत के तौर पर देखते हैं।

​इसी लचर व्यवस्था के बीच रहता है पेड्डी (राम चरण), जिसे स्थानीय इलाकों में ‘आटा कुली’ यानी पैसों के लिए खेलने वाला मजदूर खिलाड़ी कहा जाता है। विजयनगरम और बोब्बिली के बीच जब भी क्रिकेट या कोई लोकल मैच होता है, तो पेड्डी को अपनी टीम में शामिल करने के लिए बोलियां लगती हैं। पेड्डी के लिए खेल सिर्फ पेट पालने का जरिया है। लेकिन कहानी तब एक बेहद इमोशनल मोड़ लेती है जब उसका यह खेल पर्सनल इंट्रेस्ट से ऊपर उठकर उसके पूरे गांव को पहचान दिलाने का इकलौता माध्यम बन जाता है। एक बेपरवाह दिहाड़ी मजदूर से लेकर अपने लोगों के स्वाभिमान की खातिर सब कुछ दांव पर लगा देने वाले नायक तक का पेड्डी का सफर ही इस फिल्म की जान है।

​अभिनय: राम चरण का वन-मैन शो, साथी कलाकारों का मिला मजबूत साथ

​पूरी फिल्म राम चरण के मजबूत कंधों पर टिकी है और उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। उनका एंट्री सीन थिएटर में दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देता है। फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन से लेकर किरदार की लाचारी और उसके भीतर छिपे गुस्से को राम चरण ने अपने हाव-भाव में पूरी तरह उतारा है। चाहे वह धोखेबाजी से भरा क्रिकेट का मैदान हो या पुलिस गोदाम में अपनी पहचान साबित करने के लिए गिड़गिड़ाने का दृश्य, राम चरण दर्शकों को अपने साथ रोने पर मजबूर कर देते हैं। क्लाइमेक्स की ओर बढ़ते हुए उनका किरदार एक ऐसा मोड़ लेता है, जिसे करने की हिम्मत कोई भी कमर्शियल हीरो आसानी से नहीं करेगा। उनका डांस हमेशा की तरह लाजवाब और फिल्म की यूएसपी (USP) है।

​कन्नड़ सिनेमा के दिग्गज स्टार शिव राजकुमार ने ‘गोरनायडू’ के किरदार में अद्भुत स्क्रीन प्रेजेंस दिखाई है। पेड्डी और उनके बीच के गुरु-शिष्य वाले दृश्य फिल्म के सबसे मजबूत इमोशनल पिलर हैं, जो हॉलीवुड की मशहूर फिल्म ‘कराटे किड’ की याद दिलाते हैं। विलेन के रूप में जगपति बाबू (अप्पला सूरी) कुछ जगहों पर लाउड लगे हैं, लेकिन कुल मिलाकर सहज रहे हैं। बोमन ईरानी ने ओलंपिक कमेटी के अधिकारी के रूप में एक छोटा लेकिन बेहद इंपैक्टफुल कैमियो किया है।

​कहां चूक गई फिल्म?

​तमाम खूबियों के बाद भी ‘पेड्डी’ एक मुकम्मल फिल्म बनने से थोड़ा दूर रह जाती है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी जाह्नवी कपूर द्वारा निभाया गया ‘अचियम्मा’ का किरदार है। समस्या सिर्फ यह नहीं है कि उनकी प्रेम कहानी मुख्य प्लॉट से भटकी हुई लगती है, बल्कि दिक्कत उनके किरदार के चित्रण में है। फिल्म एक तरफ तो आत्मसम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन दूसरी तरफ जाह्नवी के पूरे ट्रैक को केवल ग्लैमर के चश्मे से दिखाती है। उनके हिस्से के डायलॉग और रोमांटिक सीन काफी पुराने जमाने के लगते हैं।

​इसके अलावा, दिव्येंदु (रामबुज्जी) के साथ पेड्डी की दुश्मनी का ट्रैक भी किसी मजबूत कहानी के बजाय सिर्फ एक एक्शन सीक्वेंस सेट करने का बहाना ज्यादा नजर आता है। दिव्येंदु एक मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन हीरो की छवि को बड़ा करने के चक्कर में उनके किरदार को ठीक से बिल्ड नहीं किया गया, जिससे फिल्म एक भयंकर विलेन देने से चूक गई।

​निर्देशन और लेखन की गहराई

​निर्देशक बुची बाबू साना ने यह साबित कर दिया है कि वे अपने गुरु सुकुमार (निर्देशक – पुष्पा, रंगस्थलम) से काफी कुछ सीख कर आए हैं। उन्होंने एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा उठाया है, जिससे हर कोई रिलेट कर पाएगा कि जब किसी शख्स के पास उसका पता या पहचान ही न हो, तो उसे कितनी तकलीफ होती है।

​बुची बाबू का लेखन हालांकि पारंपरिक कमर्शियल सिनेमा के फॉर्मूले (एंट्री, गाने, रोमांस, इंटरवल ब्लॉक और क्लाइमेक्स) पर ही चलता है। सोशल मीडिया लीक्स की वजह से कहानी के कई मोड़ प्रेडिक्टेबल (पूर्वानुमान योग्य) हो जाते हैं, लेकिन बुची की खूबी यह है कि वे दृश्यों को धीरे-धीरे बिल्ड करते हैं और दर्शकों के दिल में किरदारों के प्रति गहरी सहानुभूति पैदा कर देते हैं। ३ घंटे से ज्यादा लंबी होने के बावजूद फिल्म का फ्लो आपको बोर नहीं होने देता। कुश्ती, क्रिकेट और स्प्रिंटिंग (दौड़) के दृश्य खेल प्रेमियों को जरूर रास आएंगे।

​तकनीकी पक्ष: एआर रहमान का जादुई संगीत

​तकनीकी तौर पर ‘पेड्डी’ एक बेहद सलीके से बुनी गई फिल्म है। ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान का संगीत इस पूरी कहानी की धड़कन है। रहमान का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के हर एक फ्रेम की ताकत को दोगुना करता है और इमोशनल ग्राफ को सीधे ऊपर ले जाता है। आर रथनावेलु की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को एक रियल टेक्सचर देती है। गांव की मिट्टी, पारंपरिक कुश्ती के अखाड़े और धूल भरी संकरी सड़कें पर्दे पर बिल्कुल असल लगती हैं। हालांकि, फिल्म का वीएफएक्स (VFX) कई जगहों पर काफी कमजोर और नकली लगता है, जो रथनावेलु की शानदार सिनेमैटोग्राफी का मजा थोड़ा किरकिरा कर देता है। इतने बड़े बजट की फिल्म में पोस्ट-प्रोडक्शन का काम और बेहतर हो सकता था।

​अंतिम फैसला (वर्डिक्ट)

​छोटी-मोटी खामियों के बावजूद ‘पेड्डी’ को खारिज करना नामुमकिन है, क्योंकि इसकी नीयत साफ है और इसका सामाजिक सरोकार बेहद सच्चा है। यह राम चरण के करियर की सबसे बेहतरीन और ईमानदार परफॉर्मेंस में से एक है। अगर आप कमर्शियल सिनेमा के शौकीन हैं और एक ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ आपको थोड़ा भावुक भी करे, तो ‘पेड्डी’ आपके लिए सिनेमाघरों में एक बेहतरीन और यादगार अनुभव साबित होगी।

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