रूस पर नरमी के आरोपों के बीच ट्रंप प्रशासन का पलटवार: अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी का दावा— “हमने रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों लुकोइल और रोजनेफ्ट पर लगाए सबसे कड़े प्रतिबंध”
रूस पर नरमी के आरोपों के बीच ट्रंप प्रशासन का पलटवार: अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी का दावा— “हमने रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों लुकोइल और रोजनेफ्ट पर लगाए सबसे कड़े प्रतिबंध”
यूक्रेन युद्ध (Ukraine War) को लेकर अमेरिका की कूटनीतिक और आर्थिक नीतियों की हो रही चौतरफा आलोचना के बीच ट्रंप प्रशासन ने एक बड़ा और आक्रामक रुख अपनाया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी (वित्त मंत्री) स्कॉट बेसेंट (Scott Bessent) ने व्हाइट हाउस में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान दावा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने रूस के तेल और ऊर्जा क्षेत्र पर इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जितने पहले के किसी भी अमेरिकी प्रशासन ने नहीं लगाए थे।
ट्रेजरी सेक्रेटरी बेसेंट ने साफ किया कि अमेरिका ने रूस की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने के लिए उसकी दो सबसे बड़ी दिग्गज तेल कंपनियों पर सीधे और अभूतपूर्व वित्तीय प्रतिबंध (Financial Sanctions) लागू किए हैं।
”बाइडेन को पेट्रोल की कीमतें बढ़ने की चिंता थी, हमने दिखाई सख्ती”
प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जब पत्रकारों ने बेसेंट से पूछा कि कीव (यूक्रेन की राजधानी) पर हाल ही में हुए भीषण रूसी हमलों के बाद क्या वॉशिंगटन रूस पर और अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है? इस पर जवाब देते हुए बेसेंट ने वर्तमान ट्रंप प्रशासन की तुलना पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन की सरकार से कर डाली। उन्होंने कहा:
”बाइडेन प्रशासन ने चुनाव के दौरान राजनीतिक नुकसान और घरेलू बाजार में पेट्रोल (ईंधन) की कीमतें बढ़ने के डर से रूस पर बेहद हल्के प्रतिबंध लगाए थे। लेकिन हमारे प्रशासन ने सत्ता संभालते ही इस प्रतिबंध व्यवस्था को न केवल मजबूत किया, बल्कि इसका दायरा भी बढ़ाया। अक्टूबर में राष्ट्रपति ट्रंप ने मुझे व्यक्तिगत रूप से रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों—लुकोइल (Lukoil) और रोजनेफ्ट (Rosneft) पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था, और हमने तुरंत ऐसा किया।”
राजनीतिक मायने: “रूस के प्रति नरम” होने की छवि सुधारने की कोशिश
अमेरिकी रक्षा और विदेश नीति के गलियारों में ट्रंप प्रशासन पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि वे मॉस्को (रूस) और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति नरम रुख अपना रहे हैं। नीति-निर्माताओं के बीच चल रही इस बहस के बीच स्कॉट बेसेंट का यह बयान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस बयान के जरिए ट्रंप प्रशासन दुनिया और अपने पश्चिमी सहयोगियों (जैसे यूरोपीय संघ) को यह संदेश देना चाहता है कि वह रूस के खिलाफ कतई कमजोर नहीं है, बल्कि उसके उठाए कदम कई यूरोपीय देशों की तुलना में कहीं अधिक कठोर और प्रभावी हैं।
प्रतिबंधों की राजनीति और रूसी अर्थव्यवस्था का ‘सुरक्षा कवच’
लुकोइल और रोजनेफ्ट जैसी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का मुख्य उद्देश्य रूस के तेल निर्यात से होने वाली बेतहाशा कमाई को रोकना है, क्योंकि रूस अपने युद्ध खर्च (War Funding) के लिए काफी हद तक ऊर्जा राजस्व पर ही निर्भर है। हालांकि, इन प्रतिबंधों के जमीन पर होने वाले असर को लेकर दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और आलोचकों में दो अलग-अलग राय हैं:
अमेरिका का दावा: इन प्रतिबंधों से रूसी ऊर्जा सेक्टर अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और डॉलर (USD) के इस्तेमाल से दूर हो जाएगा, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।
आलोचकों और अर्थशास्त्रियों का तर्क: आलोचकों का कहना है कि इन अमेरिकी प्रतिबंधों का रूस पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है। रूस ने सूझबूझ दिखाते हुए भारत और चीन जैसे ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों के साथ अपना व्यापार और कच्चे तेल का निर्यात काफी बढ़ा लिया है, जिससे उसने अपने आर्थिक नुकसान की पूरी भरपाई कर ली है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा
ब्रीफिंग के दौरान बेसेंट ने फिलहाल किसी नए या तत्काल अतिरिक्त प्रतिबंध की घोषणा नहीं की। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका रूस पर और अधिक कड़े प्रतिबंध लगाता है या उसके तेल निर्यात को पूरी तरह ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर वैश्विक ऊर्जा कीमतों (Global Oil Prices) पर पड़ेगा। कच्चे तेल की कमी से दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक मंदी का खतरा और ज्यादा गहरा सकता है।
