विशेष रिपोर्ट: देवी सरस्वती का सिंहासन… कितनी प्राचीन है राजा भोज की ऐतिहासिक भोजशाला?
विशेष रिपोर्ट: देवी सरस्वती का सिंहासन… कितनी प्राचीन है राजा भोज की ऐतिहासिक भोजशाला?
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर इन दिनों देश के सबसे बड़े कानूनी और ऐतिहासिक विमर्श का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर पीठ) द्वारा भोजशाला को लेकर दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले के बाद इसकी प्राचीनता, इतिहास और यहाँ स्थापित वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा को लेकर जिज्ञासाएँ तेज हो गई हैं। आइए जानते हैं कि ज्ञान का यह प्राचीन मंदिर कितना पुराना है और इसका गौरवशाली इतिहास क्या रहा है।
लगभग 1,000 वर्ष प्राचीन है राजा भोज की भोजशाला
ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, भोजशाला का निर्माण सन 1034 (11वीं शताब्दी) में परमार राजवंश के सबसे प्रतापी और विद्वान राजा भोज द्वारा कराया गया था। इस लिहाज से यह धरोहर लगभग 1,000 वर्ष प्राचीन है।
राजा भोज स्वयं शास्त्रों, खगोल विज्ञान, व्याकरण और वास्तुकला के प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने धारनगरी (वर्तमान धार) को अपनी राजधानी बनाया और यहाँ शिक्षा के प्रसार के लिए एक विशाल विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसे ‘भोजशाला’ या ‘शारदा सदन’ कहा गया। यह उस दौर में देश-विदेश के शिक्षार्थियों के लिए संस्कृत, दर्शन, खगोलशास्त्र और साहित्य का सबसे बड़ा केंद्र था।
कैसा था देवी सरस्वती का सिंहासन?
भोजशाला मुख्य रूप से विद्या की देवी माँ सरस्वती (वाग्देवी) को समर्पित एक भव्य मंदिर और विश्वविद्यालय था।
वाग्देवी की दिव्य प्रतिमा: राजा भोज ने यहाँ मां वाग्देवी की एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक मार्बल (संगमरमर) की प्रतिमा स्थापित की थी। इस प्रतिमा के नीचे उत्कीर्ण शिलालेखों से इसके इतिहास का पता चलता है।
संस्कृत व्याकरण के स्तंभ: भोजशाला परिसर के भीतर आज भी 100 से अधिक ऐसे खंभे (स्तंभ) मौजूद हैं, जिन पर प्राचीन देवनागरी लिपि में संस्कृत व्याकरण के सूत्र, ‘कूर्मशतक’ (भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की स्तुति) और ‘सर्पबंध’ चक्र खुदे हुए हैं। ये इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि यह स्थान ज्ञान-विज्ञान की साधना का मुख्य केंद्र था।
लंदन में है मूल प्रतिमा, लाने की मांग तेज
इतिहास के उतार-चढ़ाव के दौरान, 19वीं शताब्दी (ब्रिटिश काल) में उत्खनन के समय मां वाग्देवी की यह ऐतिहासिक प्रतिमा अंग्रेज अधिकारी अपने साथ ले गए थे। वर्तमान में राजा भोज द्वारा स्थापित मां सरस्वती की मूल प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित रखी हुई है। हिंदू पक्ष और देश के विभिन्न संगठन लंबे समय से इस मूल प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला में फिर से स्थापित करने की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में परिसर में केवल इसकी एक अनुकृति (रेप्लिका) का उपयोग प्रतीकात्मक रूप से किया जाता है।
मंदिर से मस्जिद बनने का कालक्रम
इतिहासकारों के अनुसार, 13वीं और 14वीं शताब्दी में मालवा क्षेत्र पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण शुरू हुए।
पहला हमला: अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण (1305 ई.) के दौरान इस ज्ञान केंद्र को भारी क्षति पहुँचाई गई।
परिवर्तन का दौर: इसके बाद 1401 ई. में मालवा सल्तनत के संस्थापक दिलावर खान गोरी और बाद में महमूद खिलजी के शासनकाल में इस प्राचीन मंदिर की संरचना को आंशिक रूप से बदलकर इसे मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया, जिसे आज ‘कमल मौला मस्जिद’ के नाम से भी जाना जाता है। यही कारण है कि इस परिसर में मंदिर के नक्काशीदार खंभे और हिंदू प्रतीक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: एएसआई सर्वे ने लगाई मुहर
वर्ष 2024 में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने कोर्ट के आदेश पर भोजशाला परिसर का 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया। एएसआई ने अपनी 2,100 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट में साफ किया कि वर्तमान संरचना का निर्माण प्राचीन हिंदू मंदिरों के अवशेषों और खंभों पर ही किया गया है। यहाँ से भगवान शिव, गणेश, विष्णु और वाग्देवी की खंडित मूर्तियां व सनातन प्रतीक मिले हैं।
इन्हीं वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर, 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि:
”ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य यह साबित करते हैं कि यह परिसर राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत अध्ययन केंद्र और मां सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर ही है।”
अदालत ने इसके धार्मिक चरित्र को पूरी तरह हिंदू मंदिर घोषित करते हुए पूर्व के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसके तहत यहाँ शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति थी, और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अलग भूमि देने का सुझाव दिया है।
सदियों के संघर्ष और इतिहास की परतों के नीचे दबी राजा भोज की यह ‘भोजशाला’ आज एक बार फिर अपने प्राचीन वैभव और अस्मिता के साथ देश के सामने खड़ी है।
