ट्रंप के दावों और बदलते वर्ल्ड ऑर्डर के बीच भारत-पाक कूटनीति: जानें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर बांग्लादेश संकट का पूरा समीकरण
ट्रंप के दावों और बदलते वर्ल्ड ऑर्डर के बीच भारत-पाक कूटनीति: जानें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर बांग्लादेश संकट का पूरा समीकरण
ताजा वैश्विक घटनाक्रमों और तेजी से बदलते वर्ल्ड ऑर्डर (World Order) के बीच दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ जहां अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत को घेरने और अपनी रणनीतिक पैठ मजबूत करने के लिए पाकिस्तान और अमेरिका के समीकरण भी बदल रहे हैं।
इस पूरे कूटनीतिक खेल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावे, भारत का कड़ा रुख और बांग्लादेश का नया संकट भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक सिरदर्द बनता जा रहा है। आइए इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं:
1. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ट्रंप के दावों का सच
भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान से ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख पाकिस्तान को लेकर बदला-बदला नजर आ रहा है। ट्रंप ने बार-बार यह दावा किया है कि उनके दखल के बाद ही भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर (युद्धविराम) संभव हो सका।
ट्रंप का दावा: डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि उन्होंने दोनों देशों से बात की और व्यापार का आश्वासन देकर महज 5 घंटे के भीतर इस युद्ध को रुकवा दिया। मई 2026 में ट्रंप ने अपने बयान को और धार देते हुए कहा कि उन्होंने व्यापार और ऊंचे टैरिफ (High Tariffs) की धमकी देकर केवल 5 घंटे में युद्ध रुकवाया था। इसके बाद उन्होंने यह भी कह दिया कि यह सीजफायर उन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और पीएम शहबाज शरीफ के अनुरोध पर ‘एक एहसान’ के तौर पर कराया था।
भारत का रुख: भारत सरकार ने शुरुआत से ही ट्रंप के इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। भारत का हमेशा से स्पष्ट रुख रहा है कि वह अपने फैसले किसी भी बाहरी देश के दबाव में आकर नहीं लेता है।
पाकिस्तान के डिप्टी पीएम ने खोली पोल: खुद पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार ने भी ट्रंप के दावों की हवा निकालते हुए यह स्वीकार किया था कि यह सीजफायर दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई सीधी बातचीत (Direct Military Talk) का नतीजा था, न कि डोनाल्ड ट्रंप के किसी दबाव का।
क्रेडिट लेने की होड़: दिलचस्प बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप अब तक लगभग छह अलग-अलग युद्धों में सीजफायर कराने का क्रेडिट खुद को दे चुके हैं और इसी आधार पर उन्होंने अपने लिए ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की मांग भी कर दी है।
2. वाशिंगटन के सामने पाकिस्तान की पुरानी रणनीति
पाकिस्तान की यह पुरानी कूटनीतिक आदत रही है कि जब भी उसे भारत से सैन्य या रणनीतिक स्तर पर बड़ा खतरा महसूस होता है, वह फौरन वाशिंगटन की शरण में पहुंच जाता है।
परमाणु युद्ध का डर: पाकिस्तान हमेशा अमेरिका और वैश्विक समुदाय को यह डर दिखाता है कि दो परमाणु संपन्न (Nuclear-Armed) देशों के बीच की जंग पूरी दुनिया को खतरे में डाल देगी, ताकि अमेरिका इसमें दखल दे।
आर्थिक मजबूरी: पाकिस्तान को अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अमेरिकी वित्तीय मदद की सख्त जरूरत है। वहीं, दूसरी ओर ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच वाशिंगटन भी इस्लामाबाद का अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहा है। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप लगातार पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को अपने करीब ला रहे हैं।
भारत का द्विपक्षीय रुख: भारत हमेशा से पाकिस्तान के साथ किसी भी विवाद को पूरी तरह ‘द्विपक्षीय’ (Bilateral) मानता आया है और कश्मीर या किसी भी अन्य मुद्दे पर तीसरे देश की मध्यस्थता का सख्ती से विरोध करता है।
3. भारत के खिलाफ पाकिस्तान-बांग्लादेश की कूटनीतिक जुगलबंदी
दक्षिण एशिया के बदलते समीकरणों में सबसे बड़ा मोड़ बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद आया है। शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से पाकिस्तान और बांग्लादेश अपनी दशकों पुरानी ऐतिहासिक कड़वाहट को भूलकर तेजी से करीब आ रहे हैं।
भारत को घेरने की साजिश: पाकिस्तान इस नए समीकरण का फायदा उठाकर भारत को पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों से घेरने के लिए बांग्लादेश में अपनी कूटनीतिक और सैन्य पैठ बढ़ा रहा है।
4. बांग्लादेश में अमेरिकी जहाजों की तैनाती: नई दिल्ली के लिए नया सिरदर्द
वैश्विक महाशक्ति बनने की होड़ में अमेरिका का मुख्य लक्ष्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। इस रणनीति के तहत अमेरिका, बांग्लादेश के साथ अपने सैन्य जहाजों को तैनात करने की एक बड़ी डील पर काम कर रहा है।
यह स्थिति भारत के लिए सबसे ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि:
पाकिस्तान को भारत की पूर्वी सीमा (बांग्लादेश) के ठीक बगल में अमेरिका की सैन्य छत्रछाया मिल रही है।
भारत के पड़ोसी देश में अमेरिकी सेना या जहाजों की मौजूदगी नई दिल्ली के लिए आने वाले समय में एक गंभीर रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौती साबित होने वाली है।
