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गांगुली ने बचाया था द्रविड़ का करियर! पूर्व कप्तान के बयान से मची हलचल, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

गांगुली ने बचाया था द्रविड़ का करियर! पूर्व कप्तान के बयान से मची हलचल, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

​भारतीय क्रिकेट इतिहास में सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) और राहुल द्रविड़ (Rahul Dravid) की जोड़ी को ‘जय-वीरू’ की तरह देखा जाता है। दोनों ने साल 1996 में लॉर्ड्स के मैदान पर एक साथ अपने टेस्ट करियर का आगाज किया था और सालों तक टीम इंडिया की रीढ़ बने रहे।

​लेकिन हाल ही में सौरव गांगुली के एक पुराने बयान ने सोशल मीडिया पर फिर से हलचल मचा दी है। दादा के इस दावे ने क्रिकेट गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है कि अगर साल 1999-2000 के दौरान उन्होंने एक कप्तान के तौर पर स्टैंड नहीं लिया होता, तो शायद राहुल द्रविड़ का वनडे (ODI) करियर बहुत पहले ही खत्म हो गया होता! आइए जानते हैं कि गांगुली ने ऐसा क्या कहा जिससे अचानक यह विवाद चर्चा में आ गया।

​वनडे टीम से ड्रॉप होने वाले थे राहुल द्रविड़!

​दरअसल, सौरव गांगुली ने एक इंटरव्यू के दौरान साल 1999 और 2000 के उस दौर को याद किया जब वह नए-नए कप्तान बने थे। उस समय राहुल द्रविड़ को विशुद्ध रूप से ‘टेस्ट स्पेशलिस्ट’ बल्लेबाज माना जाता था। उनकी धीमी बल्लेबाजी शैली (स्ट्राइक रेट) के कारण चयनकर्ता (Selectors) और टीम मैनेजमेंट उन्हें वनडे टीम से बाहर करने का मन बना चुके थे।

​गांगुली ने खुलासा करते हुए कहा:

​”एक समय ऐसा था जब चयनकर्ता राहुल द्रविड़ को वनडे टीम में नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि द्रविड़ सीमित ओवरों के क्रिकेट के लिहाज से काफी धीमे हैं। लेकिन मुझे पता था कि द्रविड़ किस दर्जे के खिलाड़ी हैं। मैंने चयनकर्ताओं से साफ कह दिया था कि द्रविड़ मेरी वनडे टीम का हिस्सा रहेंगे और मैं उन्हें ड्रॉप नहीं होने दूंगा।”

​गांगुली का वो ‘मास्टरस्ट्रोक’ जिसने द्रविड़ को बनाया ‘द वॉल’

​सौरव गांगुली ने न सिर्फ द्रविड़ को टीम में बनाए रखा, बल्कि उनके वनडे करियर को बचाने के लिए एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने द्रविड़ की पूरी इमेज ही बदल दी। गांगुली ने द्रविड़ को वनडे में विकेटकीपिंग करने की जिम्मेदारी सौंप दी।

​इस फैसले के पीछे गांगुली की दो बड़ी सोच थीं:

​अतिरिक्त बल्लेबाज की जगह: द्रविड़ के विकेटकीपिंग करने से टीम को एक अतिरिक्त बल्लेबाज या ऑलराउंडर खिलाने का मौका मिल गया, जिससे टीम का संतुलन बेहद मजबूत हो गया।

​जगह पक्की होना: विकेटकीपर-बल्लेबाज बनने के बाद सिलेक्टर्स के लिए द्रविड़ को टीम से बाहर करना नामुमकिन हो गया।

​गांगुली के इस फैसले का नतीजा यह हुआ कि राहुल द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट में न सिर्फ 10,000 से अधिक रन बनाए, बल्कि वह टीम के सबसे भरोसेमंद फिनिशर और एंकर बन गए।

​सोशल मीडिया पर भिड़े गांगुली और द्रविड़ के फैंस

​इस बयान के दोबारा वायरल होने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (X और इंस्टाग्राम) पर क्रिकेट फैंस दो गुटों में बंट गए हैं:

​गांगुली के फैंस का कहना है: दादा हमेशा से ‘कैप्टन्स कैप्टन’ रहे हैं। उन्होंने सिर्फ द्रविड़ ही नहीं, बल्कि वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, हरभजन सिंह और एमएस धोनी जैसे दिग्गजों को बैक किया और उनका करियर बनाया। अगर दादा अड़ते नहीं, तो द्रविड़ का वनडे करियर सच में खत्म हो जाता।

​द्रविड़ के फैंस का तर्क है: राहुल द्रविड़ अपनी खुद की काबिलियत और कड़ी मेहनत की वजह से टीम में थे। 1999 के वर्ल्ड कप में द्रविड़ सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज थे। ऐसे खिलाड़ी को कोई भी कप्तान ड्रॉप करने का जोखिम नहीं उठा सकता था। गांगुली ने मदद जरूर की, लेकिन करियर बचाने का दावा करना द्रविड़ के कद को छोटा करने जैसा है।

​निष्कर्ष: राजनीति और कप्तानी के फैसलों के अपने अलग पहलू हो सकते हैं, लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि सौरव गांगुली की कप्तानी और राहुल द्रविड़ की बल्लेबाजी ने मिलकर भारतीय क्रिकेट को उस मुकाम पर पहुंचाया, जहां से टीम इंडिया ने विदेशों में जीतना सीखा।

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