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​सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘जैविक पिता नहीं तो बच्चे के भरण-पोषण के लिए बाध्य नहीं’, DNA रिपोर्ट को माना सर्वोपरि

यह कानूनी समाचार पारिवारिक कानून और वैज्ञानिक साक्ष्यों की महत्ता को लेकर एक बड़ा नजीर (precedent) पेश करता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून ‘अनुमान’ (Presumption) से ऊपर ‘सत्य’ (Truth) को तरजीह देता है, खासकर जब वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हों।

​सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘जैविक पिता नहीं तो बच्चे के भरण-पोषण के लिए बाध्य नहीं’, DNA रिपोर्ट को माना सर्वोपरि

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि वैज्ञानिक रूप से (DNA टेस्ट के जरिए) यह सिद्ध हो जाए कि कोई व्यक्ति किसी बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे उस बच्चे के भरण-पोषण (Maintenance) के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि भले ही बच्चा विवाह की अवधि के दौरान पैदा हुआ हो, लेकिन अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण कानूनी अनुमानों से अधिक प्रभावी होते हैं।

​डीएनए रिपोर्ट ने पलटा मामला

​यह मामला साल 2016 में हुई एक शादी से जुड़ा है। पति-पत्नी के बीच विवाद के बाद महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत खुद और अपनी बेटी के लिए भरण-पोषण की मांग की थी। पति द्वारा पितृत्व (Paternity) पर सवाल उठाने के बाद मजिस्ट्रेट ने डीएनए टेस्ट का आदेश दिया था।

​रिपोर्ट का निष्कर्ष: डीएनए जांच में यह साबित हो गया कि वह व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है।

​अदालती रुख: ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने भी मां की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें बच्ची के लिए मेंटेनेंस की मांग की गई थी।

​कानून बनाम विज्ञान: धारा 112 की व्याख्या

​अदालत ने इंडियन एविडेंस एक्ट (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 116) पर गौर किया। सामान्यतः यह धारा मानती है कि शादी के दौरान पैदा हुआ बच्चा वैध है। हालांकि, अदालत ने 2014 के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा:

​”जब वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA) पूरी तरह स्पष्ट हों, तो वे कानूनी धारणा (Legal Presumption) पर भारी पड़ते हैं। न्याय का उद्देश्य सत्य को उजागर करना है।”

​बच्चे के भविष्य पर कोर्ट गंभीर

​भले ही अदालत ने व्यक्ति को मेंटेनेंस की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, लेकिन बच्ची के भविष्य और कल्याण को लेकर संवेदनशीलता दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को विशेष निर्देश दिए हैं:

​बच्ची की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य स्थिति की तत्काल जांच की जाए।

​यदि बच्ची को सरकारी सहायता की आवश्यकता है, तो उसे सुनिश्चित किया जाए।

​DNA टेस्ट पर सावधानी की सलाह

​अदालत ने यह भी दोहराया कि डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में और सावधानी से दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चे की गरिमा पर आंच न आए। चूंकि इस मामले में टेस्ट पहले ही हो चुका था और मां ने रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए इसे अंतिम साक्ष्य माना गया।

​महत्वपूर्ण निष्कर्ष: यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहाँ पितृत्व को लेकर विवाद है, और यह साबित करता है कि आधुनिक न्यायशास्त्र में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका निर्णायक है।

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