परिसीमन पर आर-पार की जंग: स्टालिन ने जलाई विधेयक की कॉपी, लहराया काला झंडा, बोले- ‘काला कानून’
परिसीमन पर आर-पार की जंग: स्टालिन ने जलाई विधेयक की कॉपी, लहराया काला झंडा, बोले- ‘काला कानून’
नामक्कल (तमिलनाडु): केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन विधेयक के खिलाफ तमिलनाडु में तीखा विरोध तेज हो गया है। मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने गुरुवार को नामक्कल में प्रतीकात्मक प्रदर्शन करते हुए विधेयक की एक प्रति जला दी और काला झंडा लहराया। उन्होंने इसे ‘काला कानून’ करार दिया और आरोप लगाया कि यह दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु को सजा दे रहा है।
स्टालिन ने कहा, “यह विधेयक तमिलों को उनकी ही भूमि पर शरणार्थी बनाने की साजिश है। 1960 के दशक की हिंदी विरोधी आंदोलन की आग को आज मैंने फिर जला दिया है।” उन्होंने काले कपड़े पहने हुए इस प्रदर्शन का नेतृत्व किया और राज्यभर में लोगों से घरों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर काला झंडा फहराने की अपील की।
क्यों है विवाद?
प्रस्तावित परिसीमन विधेयक लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं को 2011 की जनगणना के आधार पर फिर से तय करने का प्रावधान करता है। दक्षिणी राज्यों का आरोप है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल होने की वजह से उनका संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जबकि उत्तरी राज्यों को फायदा मिलेगा। स्टालिन ने इसे “दक्षिण भारत की आवाज दबाने की साजिश” बताया।
उनके बेटे और उप-मुख्यमंत्री उद्धयनिधि स्टालिन ने भी मदुरै में विधेयक की प्रति जलाकर विरोध जताया और कहा कि केंद्र तमिलनाडु के प्रतिनिधित्व को कम करने की कोशिश कर रहा है।
राज्यव्यापी विरोध
डीएमके ने 16 अप्रैल को पूरे तमिलनाडु में काला झंडा अभियान चलाया।
स्टालिन ने डीएमके सांसदों और जिला सचिवों की आपात बैठक भी बुलाई थी।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर केंद्र विधेयक आगे बढ़ाता है तो राज्य में बड़े स्तर पर आंदोलन होगा।
यह विरोध संसद के विशेष सत्र के ठीक पहले शुरू हुआ, जिसमें परिसीमन संबंधी संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किए जाने की संभावना है।
स्टालिन का संदेश: “द्रविड़ भूमि पर यह आग फैलेगी। भाजपा की अहंकारपूर्ण नीतियों को जवाब मिलेगा।”
दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) में परिसीमन को लेकर गहरा असंतोष है। कई विपक्षी दल भी केंद्र की इस कदम का विरोध कर रहे हैं।
नोट: परिसीमन का मुद्दा संवैधानिक है और लंबे समय से चर्चा में रहा है। उत्तराखंड, दक्षिण भारत और अन्य राज्यों के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
