राजनीति

परिसीमन और महिला आरक्षण: मोदी सरकार का ‘मास्टरस्ट्रोक’ या विपक्ष के लिए राजनीतिक जाल?

परिसीमन और महिला आरक्षण: मोदी सरकार का ‘मास्टरस्ट्रोक’ या विपक्ष के लिए राजनीतिक जाल?

​नई दिल्ली | 16 अप्रैल, 2026

​केंद्र की मोदी सरकार ने संसद के विशेष सत्र में 131वां संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक 2026 पेश कर देश की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। सरकार का यह कदम 2023 के ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को धरातल पर उतारने की दिशा में सबसे बड़ा प्रयास माना जा रहा है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष के सामने एक धर्मसंकट खड़ा कर दिया है: यदि वे बिल का विरोध करते हैं, तो ‘महिला विरोधी’ कहलाने का डर है, और यदि समर्थन करते हैं, तो परिसीमन के जरिए उत्तर-दक्षिण के सियासी संतुलन बिगड़ने का खतरा।

​क्या है सरकार का ‘प्लान 2029’?

​सरकार द्वारा पेश किए गए नए विधेयकों का मुख्य उद्देश्य 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करना है। इसके लिए सरकार ने जो खाका तैयार किया है, उसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

​लोकसभा का विस्तार: सदन की सीटों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 तक की जा सकती है।

​परिसीमन का आधार: आरक्षण को लागू करने के लिए सीटों का नए सिरे से निर्धारण (Delimitation) अनिवार्य है। सरकार इसके लिए 2011 की जनगणना या हालिया जनसंख्या आंकड़ों का सहारा ले सकती है।

​यूपी-जम्मू और कश्मीर: दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी इसे लागू करने का प्रस्ताव है।

​विपक्ष का धर्मसंकट: ‘ट्रैप’ से निकलने की चुनौती

​विपक्ष (INDIA गठबंधन) फिलहाल रक्षात्मक के बजाय आक्रामक रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन राह आसान नहीं है। विपक्ष इस जाल से निकलने के लिए निम्नलिखित रणनीतियों पर काम कर रहा है:

​1. ‘आरक्षण अभी, परिसीमन बाद में’ का नारा

​विपक्ष का सबसे बड़ा तर्क यह है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से क्यों जोड़ा जा रहा है? कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों का कहना है कि सरकार वर्तमान सीटों पर ही तुरंत आरक्षण लागू क्यों नहीं करती। इस तर्क के जरिए वे खुद को ‘महिला हितैषी’ और सरकार को ‘देरी करने वाला’ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

​2. उत्तर बनाम दक्षिण का मुद्दा (Federalism)

​विपक्ष इस मुद्दे को ‘राज्यों के अधिकारों’ से जोड़ रहा है। दक्षिण भारतीय राज्यों (तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना) का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, इसलिए परिसीमन होने पर उनकी सीटें घट सकती हैं या उत्तर भारत (UP, बिहार) के मुकाबले उनका प्रभाव कम हो जाएगा। विपक्ष इसे “दक्षिण के साथ अन्याय” बताकर क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड खेल रहा है।

​3. ‘OBC कोटा’ का कवच

​विपक्ष ने आरक्षण के भीतर OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग को फिर से तेज कर दिया है। ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के जरिए विपक्ष पिछड़ा वर्ग कार्ड खेलकर भाजपा के महिला कार्ड की धार को कुंद करने की जुगत में है।

​सियासी बिसात: आगे क्या?

​राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी सरकार ने इस बिल के जरिए 2029 की चुनावी पिच अभी से तैयार कर दी है। लोकसभा की सीटें बढ़ने से किसी भी मौजूदा सांसद की सीट छिनने का डर खत्म हो जाएगा, जिससे भाजपा के भीतर का असंतोष भी कम होगा।

​विपक्ष की मुश्किल: यदि संसद में इंडिया गठबंधन ने इस बिल के खिलाफ वोट दिया, तो भाजपा इसे “ऐतिहासिक महिला अधिकार बिल को रोकने की कोशिश” के तौर पर प्रचारित करेगी।

​अब देखना यह होगा कि क्या विपक्ष परिसीमन की विसंगतियों को जनता के बीच प्रभावी ढंग से रख पाता है या फिर ‘नारी शक्ति’ के इस नैरेटिव में उलझकर रह जाता है। फिलहाल, संसद का यह सत्र भारतीय लोकतंत्र की अगली दो दशकों की दिशा तय करने वाला साबित हो रहा है।

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