सफर-ए-नीतीश कुमार: ‘सुशासन बाबू’ बनने से ‘किंगमेकर’ तक, बिहार की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ी की दास्तान
सफर-ए-नीतीश कुमार: ‘सुशासन बाबू’ बनने से ‘किंगमेकर’ तक, बिहार की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ी की दास्तान
पटना: बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से एक ही चेहरा धुरी बना हुआ है— नीतीश कुमार। उन्हें कोई ‘चाणक्य’ कहता है, कोई ‘पलटू राम’ तो कोई ‘सुशासन बाबू’। लेकिन हकीकत यह है कि उनके बिना बिहार की सत्ता की कल्पना करना आज भी मुश्किल है। एक साधारण इंजीनियर से लेकर रिकॉर्ड 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने तक का उनका सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई से जननायक के साथ तक
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर जेपी आंदोलन की कोख से शुरू हुआ। एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर होने के बावजूद उन्होंने राजनीति की कठिन डगर चुनी। कर्पूरी ठाकुर जैसे दिग्गजों के सानिध्य में राजनीति के गुर सीखने वाले नीतीश ने 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर राजनीति शुरू की, लेकिन जल्द ही रास्ते अलग हो गए।
’सुशासन बाबू’ का उदय: 2005 का वो मोड़
साल 2005 बिहार के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। 15 साल के लालू-राबड़ी शासन को खत्म कर नीतीश कुमार सत्ता में आए। यहीं से शुरू हुई ‘दास्तान-ए-सुशासन’।
कानून का राज: अपराध पर लगाम और ‘जंगलराज’ की छवि को बदलना।
शिक्षा और बेटियां: ‘साइकिल योजना’ ने बिहार की बेटियों को स्कूल तक पहुँचाया, जिसने एक मौन क्रांति पैदा की।
सड़कों का जाल: गाँव-गाँव तक पक्की सड़कों का निर्माण नीतीश सरकार की बड़ी उपलब्धि रही।
सोशल इंजीनियरिंग के ‘मास्टर’
नीतीश कुमार ने बिहार में ‘अति पिछड़ा’ (EBC) और ‘महादलित’ का नया वोट बैंक तैयार किया। यह उनकी सोशल इंजीनियरिंग का ही कमाल है कि गठबंधन चाहे भाजपा के साथ हो या राजद के साथ, सत्ता की चाबी हमेशा उन्हीं के पास रहती है।
सत्ता के गलियारों में ‘पलटी’ का विवाद
नीतीश कुमार के सफर में सबसे विवादित पहलू उनका बार-बार पाला बदलना रहा है।
”मेरा लक्ष्य बिहार का विकास है, और इसके लिए मैं किसी भी हद तक समझौता कर सकता हूँ।” — नीतीश कुमार (अक्सर दिए जाने वाले बयानों का सारांश)
उनके विरोधियों ने उन्हें ‘पलटू राम’ की उपाधि दी, लेकिन समर्थकों का मानना है कि उन्होंने हमेशा ‘बिहार फर्स्ट’ को प्राथमिकता दी और केंद्र की राजनीति में भी अपनी धाक जमाए रखी।
उपलब्धियां जो मील का पत्थर बनीं
शराबबंदी: महिलाओं के वोट बैंक को साधने के लिए लिया गया कड़ा फैसला।
जाति आधारित गणना: देश भर में नई बहस छेड़ने वाला ऐतिहासिक कदम।
सात निश्चय योजना: विकास को घर-घर तक पहुँचाने का ब्लूप्रिंट।
निष्कर्ष: सफर-ए-नीतीश कुमार अभी जारी है। वह भारतीय राजनीति के वो बिरले नेता हैं जिनके पास अपना कोई बड़ा जातिगत आधार नहीं है, फिर भी वह अपनी सूझबूझ और ‘सुशासन’ की छवि के दम पर बिहार के सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री बन चुके हैं। इतिहास उन्हें किस रूप में याद रखेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन वर्तमान में वह बिहार की सत्ता के निर्विवाद ‘धुरंधर’ हैं।
