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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: घर में ‘जले हुए नोट’ मिलने के बाद शुरू हुई थी महाभियोग की प्रक्रिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: घर में ‘जले हुए नोट’ मिलने के बाद शुरू हुई थी महाभियोग की प्रक्रिया

​इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया है। यह इस्तीफा उस समय आया है जब वे अपने आवास पर भारी मात्रा में नकदी और जले हुए नोट मिलने के मामले में संसदीय जांच और महाभियोग (Impeachment) की कार्यवाही का सामना कर रहे थे।

​राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में जस्टिस वर्मा ने कहा:

​”महामहिम, मैं उन कारणों से आपके कार्यालय को बोझिल नहीं करना चाहता जिन्होंने मुझे यह कदम उठाने पर मजबूर किया है, लेकिन मैं अत्यंत दुख के साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा दे रहा हूँ।”

​क्या है पूरा मामला?

​विवाद की शुरुआत 14 मार्च, 2025 को हुई थी, जब जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत थे। उस दिन दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के एक स्टोर रूम में आग लग गई थी। आग बुझाने पहुँचे दमकलकर्मियों को वहां 500-500 के नोटों की गड्डियां और भारी मात्रा में जले हुए नोट मिले थे।

​वीडियो वायरल: घटना के समय जस्टिस वर्मा दिल्ली में नहीं थे, लेकिन जले हुए नोटों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए, जिससे न्यायिक हलकों में हड़कंप मच गया।

​इन-हाउस जांच: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने तीन जजों की एक समिति गठित की थी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नोटों पर जस्टिस वर्मा या उनके परिवार का नियंत्रण था, जिसके बाद उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई थी।

​ट्रांसफर: विवाद बढ़ने के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से हटाकर 5 अप्रैल, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया था, जहाँ वे बिना किसी न्यायिक कार्य (Judicial Work) के पद पर बने हुए थे।

​संसद में चल रही थी महाभियोग की तैयारी

​जस्टिस वर्मा द्वारा पद छोड़ने से इनकार करने के बाद, लोकसभा के 146 सदस्यों ने उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया था। लोकसभा अध्यक्ष ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था, जिसकी कार्यवाही वर्तमान में जारी थी।

​इस्तीफे के मायने

​कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि महाभियोग की कार्यवाही पूरी होने से पहले इस्तीफा देने से जस्टिस वर्मा अपनी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को सुरक्षित रख सकते हैं, जो पद से हटाए जाने की स्थिति में छीने जा सकते थे।

​जस्टिस वर्मा ने 1992 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से ही वकालत शुरू की थी और 2013 में वे जज बने थे। उनके इस इस्तीफे ने एक बार फिर न्यायपालिका में शुचिता और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है।

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