ओम प्रकाश राजभर ने क्यों बदली अपनी सीट? हार की आशंका या सपा के साथ नई खिचड़ी; जानें इनसाइड स्टोरी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओम प्रकाश राजभर (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी – SBSP अध्यक्ष और योगी सरकार में पंचायती राज व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री) का नया कदम चर्चा का विषय बन गया है। राजभर ने अपनी पारंपरिक जहूराबाद (गाजीपुर) सीट छोड़कर आजमगढ़ की अतरौलिया विधानसभा सीट से 2027 के विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। साथ ही उन्होंने बेटे को दीदारगंज से मैदान में उतारने की भी बात कही है।
सीट बदलने का मुख्य कारण क्या है?
हार का डर सबसे बड़ा फैक्टर: राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, राजभर को जहूराबाद से इस बार जीत की संभावना कम नजर आ रही है। गाजीपुर क्षेत्र में अंसारी समुदाय का प्रभाव मजबूत है और पिछले चुनावों में वोटों का समीकरण बदलता दिख रहा है। राजभर समाज के वोट बैंक पर भी अब पूरी पकड़ नहीं रह गई है। इसलिए उन्होंने सुरक्षित विकल्प तलाशते हुए पड़ोसी जिले आजमगढ़ की अतरौलिया सीट चुनी, जहां राजभर समुदाय और पिछड़े वर्गों का बेहतर प्रभाव माना जाता है।
प्रभाव बढ़ाने की रणनीति: अतरौलिया से लड़कर राजभर अपने प्रभाव क्षेत्र को पूर्वांचल में और फैलाना चाहते हैं। बेटे को दीदारगंज से उतारकर परिवार की राजनीतिक विरासत को मजबूत करने की कोशिश भी है।
सपा में जाने के संकेत? अभी नहीं
राजभर अभी एनडीए और भाजपा सरकार में मंत्री बने हुए हैं। उन्होंने हाल के बयानों में सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है और कहा है कि सपा 2027 में सरकार बनाने का सपना छोड़ दे।
उन्होंने सपा पर आरोप लगाया है कि जहां भी सपा जाती है, वहां भाजपा की जीत सुनिश्चित हो जाती है। इस लिहाज से सपा में जाने के तत्काल संकेत नहीं दिख रहे।
हालांकि, राजभर की राजनीतिक शैली हमेशा से फ्लिप-फ्लॉप रही है — 2017 में भाजपा के साथ, 2022 में सपा के साथ, फिर 2023-24 में वापस एनडीए में। 2024 लोकसभा में उनके बेटे अरविंद राजभर की घोसी सीट पर हार के बाद से उनकी नाराजगी की खबरें भी आई थीं। बिहार चुनाव में भी सीट न मिलने पर उन्होंने नाराजगी जताई थी।
राजभर की राजनीतिक पृष्ठभूमि
राजभर सबसे पिछड़े OBC समुदाय (राजभर) के बड़े नेता माने जाते हैं। वे अक्सर सामाजिक न्याय और ओबीसी सम्मान का मुद्दा उठाते रहते हैं। उनकी पार्टी SBSP मुख्य रूप से पूर्वांचल में सक्रिय है। पिछले चुनावों में गठबंधन बदल-बदलकर उन्होंने अपनी पार्टी को जीवित रखा है, लेकिन 2024 के बाद उनका वोट ट्रांसफर प्रभाव कमजोर पड़ता दिख रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
2026 पंचायत चुनाव और 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजभर सक्रिय हैं। उन्होंने पंचायत चुनाव समय पर कराने पर जोर दिया है।
अगर भाजपा से सीट शेयरिंग या सम्मान में कमी महसूस हुई तो राजभर फिर से गठबंधन बदल सकते हैं — सपा, बसपा या अन्य विकल्प खुले हैं।
अभी उनका फोकस जहूराबाद छोड़कर नई सीट पर मजबूत आधार बनाने पर है।
नोट: यह कदम मुख्य रूप से स्थानीय समीकरण और हार के डर से प्रेरित लगता है, न कि तत्काल सपा में जाने का संकेत। राजभर की राजनीति में आखिरी फैसला हमेशा चुनावी गणित पर निर्भर करता है। 2027 के लिए अभी काफी समय है और परिस्थितियां बदल सकती हैं।
पूर्वांचल की सियासत में राजभर एक अहम खिलाड़ी बने हुए हैं, लेकिन उनका यह शिफ्ट 2027 के समीकरणों को और दिलचस्प बना सकता है।
