दशा माता व्रत 2026: दशा माता व्रत में डोरा क्यों पहनते हैं? खोलने का खास नियम क्या है?
दशा माता व्रत 2026: दशा माता व्रत में डोरा क्यों पहनते हैं? खोलने का खास नियम क्या है?
हिंदू धर्म में दशा माता व्रत (Dashamata Vrat) एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सुहागिन महिलाएं करती हैं। यह व्रत घर-परिवार की दशा (परिस्थिति) सुधारने, सुख-समृद्धि, शांति और बाधाओं को दूर करने के लिए रखा जाता है। दशा माता को मां लक्ष्मी या भगवती का एक रूप माना जाता है, जो जीवन की प्रतिकूल दशाओं को अनुकूल बनाती हैं।
2026 में दशा माता व्रत कब है?
व्रत की शुरुआत: होली के अगले दिन से (2026 में होली के बाद 4 मार्च से शुरू)।
मुख्य दिन (उद्यापन): चैत्र कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर, यानी 13 मार्च 2026 (शुक्रवार)।
समय: दशमी तिथि 13 मार्च सुबह 6:28 बजे से शुरू होकर 14 मार्च सुबह 8:10 बजे तक रहेगी। पूजा सुबह सूर्योदय के समय (मुहूर्त लगभग 6:27 AM से) करना शुभ है।
यह 10 दिनों का व्रत होता है, जिसमें महिलाएं रोजाना पूजा करती हैं और अंतिम दिन (13 मार्च) व्रत का उद्यापन (समापन) करती हैं।
डोरा क्यों पहनते हैं? क्या है इसका महत्व?
दशा माता व्रत में डोरा (कच्चे सूत का धागा) का बहुत विशेष महत्व है। मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा बनाती हैं, उसमें 10 गांठें लगाती हैं और पीपल के पेड़ (जो भगवान विष्णु का प्रतीक है) की पूजा के बाद इसे गले में बांधती हैं।
क्यों पहनते हैं?
यह डोरा दशा माता का प्रतीक माना जाता है। इसे पहनने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि, सौभाग्य बना रहता है और प्रतिकूल दशा (बुरे समय, ग्रह दोष, बाधाएं) दूर होती हैं।
10 गांठें दशमी तिथि और दस दिशाओं की सुरक्षा का प्रतीक हैं। यह जीवन की हर दशा को अनुकूल बनाने के लिए होता है।
कथा के अनुसार, राजा नल और रानी दमयंती ने भी ऐसा डोरा पहना था, जिससे उनकी बिगड़ी दशा सुधरी और संकट टल गए। (नल-दमयंती की कथा इस व्रत की मुख्य कथा है।)
साल भर गले में पहनने से निरंतर मां की कृपा बनी रहती है।
डोरा खोलने (उतारने) का खास नियम क्या है?
सामान्य नियम: डोरा साल भर गले में पहना जाता है। इसे उतारने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि यह जीवनभर की सुरक्षा और सुख के लिए होता है।
अगर उतारना हो तो:
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष में किसी शुभ मुहूर्त या अच्छे दिन (जैसे अक्षय तृतीया या अन्य शुभ तिथि) पर उतार सकते हैं।
उतारने से पहले दशा माता की पूजा करें, कथा सुनें और फिर डोरा उतारकर पीपल के पेड़ के नीचे या मंदिर में रख दें।
बीच में छोड़ना अशुभ माना जाता है। अगर स्वास्थ्य या अन्य कारण से नहीं पहन पा रहे, तो उद्यापन (समापन पूजा) करके ही उतारें।
कभी भी बिना पूजा या संकल्प के न उतारें—यह नियम तोड़ने से व्रत का फल प्रभावित होता है।
संक्षेप में पूजा विधि (संक्षिप्त)
स्नान कर संकल्प लें।
पीपल के पेड़ की पूजा करें (विष्णु स्वरूप मानकर)।
10 तार का डोरा बनाकर 10 गांठें लगाएं, पूजा करें।
नल-दमयंती की कथा सुनें।
अंत में डोरा गले में बांधें और व्रत रखें (फलाहार या एक बार भोजन)।
उद्यापन पर विशेष प्रसाद (मीठी रोटी, गुड़ आदि) चढ़ाएं।
यह व्रत परिवार की स्थिरता और सकारात्मक दशा के लिए बहुत प्रभावी माना जाता है। अगर आप या आपके घर में कोई इसे रख रहा है, तो शुभकामनाएं! क्या आपने कभी दशा माता व्रत रखा है? कमेंट में बताएं।
