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‘जन्म से तय होती है जाति, विवाह या धर्म परिवर्तन से नहीं बदलती’… इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, SC/ST एक्ट केस में बड़ा फैसला

‘जन्म से तय होती है जाति, विवाह या धर्म परिवर्तन से नहीं बदलती’… इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, SC/ST एक्ट केस में बड़ा फैसला

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से निर्धारित होती है और न तो धर्म परिवर्तन से और न ही विवाह (खासकर अंतरजातीय विवाह) से उसमें कोई बदलाव आता है। यह टिप्पणी जस्टिस अनिल कुमार-X की बेंच ने 10 फरवरी 2026 को दिए गए आदेश में की, जिसमें एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में अपील खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि:

अलीगढ़ के स्पेशल जज (एससी/एसटी एक्ट) ने 9 आरोपियों को एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत समन जारी किया था। आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर दलील दी कि शिकायतकर्ता महिला मूल रूप से पश्चिम बंगाल की निवासी है और जन्म से अनुसूचित जाति (एससी) से है, लेकिन उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया है। इसलिए उसकी मूल जाति खत्म हो गई और एससी/एसटी एक्ट के तहत केस नहीं चल सकता।

कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया:

“जन्म के समय निर्धारित जाति वही रहती है, भले ही व्यक्ति अपना धर्म बदल ले।”

“विवाह से भी किसी व्यक्ति (खासकर महिला) की जाति में कोई परिवर्तन नहीं होता।”

इसलिए शिकायतकर्ता की एससी पहचान बरकरार है और निचली अदालत का समन जारी करने का आदेश सही है। अपील खारिज।

यह फैसला एससी/एसटी एक्ट के तहत मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर रहा है, जहां अक्सर अंतरजातीय विवाह या धर्म परिवर्तन का हवाला देकर आरोपियों द्वारा बचाव किया जाता है। कोर्ट ने जोर दिया कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत आरक्षण और संरक्षण जन्म से मिली जाति पर आधारित हैं, न कि बाद की घटनाओं पर।

यह टिप्पणी सामाजिक न्याय और जाति व्यवस्था से जुड़े कानूनी बहस को नई दिशा दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एससी/एसटी महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों को मजबूती मिलेगी, भले ही वे अंतरजातीय विवाह करें।

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