Friday, June 26, 2026
अन्तर्राष्ट्रीय

ट्रंप की H-1B वीजा नीति का असर दिखा, गूगल-एप्पल ने कर्मचारियों को दी विदेश यात्रा न करने की चेतावनी; भारतीय टेक वर्कर्स सबसे ज्यादा प्रभावित

ट्रंप की H-1B वीजा नीति का असर दिखा, गूगल-एप्पल ने कर्मचारियों को दी विदेश यात्रा न करने की चेतावनी; भारतीय टेक वर्कर्स सबसे ज्यादा प्रभावित

वाशिंगटन/नई दिल्ली, 22 दिसंबर 2025: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त इमिग्रेशन नीतियों का असर अब भारतीय H-1B वीजा धारकों पर साफ दिखने लगा है। ट्रंप प्रशासन द्वारा सितंबर में नए H-1B एप्लीकेशन पर 100,000 डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) फीस लगाने और दिसंबर से सोशल मीडिया स्क्रीनिंग अनिवार्य करने के बाद वीजा रिन्यूअल में भारी देरी हो रही है। नतीजा यह कि गूगल, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट और सर्विसनाउ जैसी टेक दिग्गज कंपनियों ने अपने H-1B वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों (ज्यादातर भारतीय) को विदेश यात्रा न करने की चेतावनी दी है।

क्यों दी गई चेतावनी?

ट्रंप प्रशासन की नई सोशल मीडिया वेटिंग पॉलिसी (15 दिसंबर 2025 से लागू) के कारण अमेरिकी दूतावासों और कांसुलेट्स में वीजा इंटरव्यू की तारीखें महीनों तक पीछे खिसक गई हैं। भारत में अपॉइंटमेंट्स दिसंबर 2025 से सीधे अक्टूबर 2026 तक पोस्टपोन हो गई हैं। जिन कर्मचारियों का वीजा स्टैम्प एक्सपायर हो रहा है, उन्हें रिन्यूअल के लिए भारत या अन्य देश जाना पड़ता है, लेकिन अब वापसी में 6-12 महीने की देरी का खतरा है। इससे कर्मचारी विदेश में फंस सकते हैं, नौकरी और लीगल स्टेटस दोनों खतरे में पड़ सकता है।

गूगल और एप्पल की इंटरनल मेमो में कहा गया है कि बिना वैलिड वीजा स्टैम्प वाले कर्मचारी फिलहाल इंटरनेशनल ट्रैवल न करें। एप्पल की इमिग्रेशन लॉ फर्म फ्रागोमेन ने लिखा, “अप्रत्याशित देरी का खतरा है, अगर ट्रैवल पोस्टपोन नहीं कर सकते तो पहले कंसल्ट करें।” सैकड़ों भारतीय H-1B वर्कर्स जो छुट्टियों में भारत आए थे, अब रिन्यूअल अपॉइंटमेंट कैंसल होने से फंस गए हैं।

भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर: H-1B वीजा प्राप्तकर्ताओं में 70-75% भारतीय होते हैं। टेक सेक्टर में गूगल, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन जैसी कंपनियां हजारों भारतीय टैलेंट पर निर्भर हैं। नई फीस और देरी से कंपनियां ऑफशोरिंग बढ़ा सकती हैं, जिससे अमेरिका में भारतीयों की नौकरियां कम हो सकती हैं। NASSCOM का कहना है कि इससे बिजनेस कंटिन्यूटी प्रभावित होगी और प्रोजेक्ट्स डिले हो सकते हैं।

ट्रंप प्रशासन इसे “अमेरिकन वर्कर्स की प्राथमिकता” बता रहा है, लेकिन क्रिटिक्स कहते हैं कि इससे US टेक इंडस्ट्री को टैलेंट की कमी झेलनी पड़ेगी। कई भारतीय प्रोफेशनल्स अब कनाडा, यूरोप जैसे विकल्प तलाश रहे हैं।

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