राजनीति

‘ये निजी संपत्ति नहीं…’: नेहरू के निजी दस्तावेजों पर बवाल, सरकार ने सोनिया गांधी से वापसी की मांग की!

‘ये निजी संपत्ति नहीं…’: नेहरू के निजी दस्तावेजों पर बवाल, सरकार ने सोनिया गांधी से वापसी की मांग की!

नई दिल्ली, 17 दिसंबर 2025: जवाहरलाल नेहरू के निजी पत्रों और दस्तावेजों को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। संस्कृति मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के कागजात ‘गुम’ नहीं हैं, बल्कि उनकी लोकेशन ज्ञात है – ये सोनिया गांधी के पास हैं। मंत्रालय ने इन दस्तावेजों को राष्ट्रीय धरोहर बताते हुए कहा कि ये निजी संपत्ति नहीं हैं और इन्हें प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) को वापस लौटाया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

2008 की घटना: यूपीए सरकार के दौरान (29 अप्रैल 2008) सोनिया गांधी के प्रतिनिधि एमवी राजन की चिट्ठी पर नेहरू के निजी परिवार पत्र और नोट्स के 51 कार्टन PMML (तब नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी) से सोनिया गांधी को सौंप दिए गए।

वापसी की मांग: PMML ने लगातार पत्राचार किया, जिसमें 2025 में 28 जनवरी और 3 जुलाई को चिट्ठियां लिखी गईं। मंत्रालय ने कहा कि ये दस्तावेज सार्वजनिक अभिलेखागार में होने चाहिए, बंद दरवाजों के पीछे नहीं।

राष्ट्रीय धरोहर: केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, “ये राष्ट्र की डॉक्यूमेंट्री हेरिटेज हैं, निजी संपत्ति नहीं। शोधकर्ताओं, नागरिकों और संसद को नेहरू युग के निष्पक्ष अध्ययन के लिए इनकी जरूरत है।”

विवाद की शुरुआत

लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा के सवाल पर मंत्री ने कहा कि कोई दस्तावेज गुम नहीं।

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे आधार बनाकर माफी की मांग की।

जवाब में मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर थ्रेड पोस्ट कर 2008 का हवाला दिया और वापसी की अपील की।

शेखावत ने कांग्रेस पर तंज कसा कि यूपीए काल में सार्वजनिक संस्थानों को परिवार की जागीर समझा जाता था।

नेहरू के पत्रों में क्या खास?

ये दस्तावेज नेहरू के निजी पत्राचार हैं, जिनमें लेडी एडविना माउंटबेटन सहित कई प्रमुख हस्तियों को लिखे पत्र शामिल हो सकते हैं। ये ऐतिहासिक महत्व के हैं और शोधकर्ताओं के लिए मूल्यवान।

कांग्रेस की ओर से अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन पहले ऐसे आरोपों को खारिज किया जाता रहा है। सरकार ने जोर दिया कि सोनिया गांधी ने सहयोग का वादा किया था, अब उसे निभाने का समय है। यह विवाद नेहरू युग के इतिहास को पारदर्शी बनाने की बहस को फिर गरमा रहा है।

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