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शादी जब सिर्फ कागज पर रह जाए तो उसे तोड़ देना बेहतर: सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

शादी जब सिर्फ कागज पर रह जाए तो उसे तोड़ देना बेहतर: सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अगर वैवाहिक विवाद लंबे समय तक अदालतों में लंबित रहते हैं, तो शादी केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाती है। ऐसे में इसे बनाए रखने से कोई फायदा नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के लिए इसे तोड़ देना बेहतर है। यह टिप्पणी 15 दिसंबर 2025 को न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक तलाक मामले की सुनवाई के दौरान की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला शिलांग (मेघालय) के एक दंपति का है, जिनकी शादी 4 अगस्त 2000 को हुई थी। मात्र दो साल बाद 2003 में विचारों के मतभेद के कारण दोनों अलग हो गए और मुकदमेबाजी शुरू हो गई। पिछले 24 वर्षों से वे अलग-अलग रह रहे हैं और उनके कोई संतान नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने 2009 में पति की याचिका पर तलाक दे दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने 2011 में इसे रद्द कर दिया। पति ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और 14 साल बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया।

पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट के तलाक आदेश को बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के वैवाहिक जीवन के प्रति दृष्टिकोण में गहरे मतभेद हैं और उन्होंने लंबे समय तक एक-दूसरे से तालमेल बिठाने से इनकार किया है। यह स्थिति दोनों के लिए मानसिक क्रूरता के समान है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबी मुकदमेबाजी से शादी केवल कागज पर रह जाती है। पीठ ने कहा, “वैवाहिक विवादों का लंबे समय तक लंबित रहना विवाह को केवल कागजों तक सीमित कर देता है। ऐसे में मुकदमेबाजी को लंबा खींचने से कोई फायदा नहीं, बल्कि पक्षकारों और समाज दोनों के हित में रिश्ते को खत्म कर देना बेहतर है।” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि सुलह की कोई उम्मीद न होने पर लंबा अलगाव दोनों पक्षों के लिए क्रूरता है।

आर्टिकल 142 का इस्तेमाल

हिंदू मैरिज एक्ट में ‘अटूट ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज’ (irretrievable breakdown) अभी तलाक का आधार नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142(1) के तहत ‘पूर्ण न्याय’ करने की अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया। इस शक्ति से कोर्ट ने शादी को भंग कर दिया, भले ही एक पक्ष सहमत न हो। कोर्ट ने कहा कि कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं पूरा होगा अगर मुकदमा बिना राहत के लंबित रखा जाए।

इस फैसले का महत्व

यह फैसला उन जोड़ों के लिए राहत की किरण है जो वर्षों से अलग रह रहे हैं लेकिन कानूनी आधार न होने से तलाक नहीं ले पा रहे। कोर्ट ने समाज को संदेश दिया कि मृत रिश्ते को जबरन जीवित रखना न तो पक्षकारों के हित में है और न समाज के। हालांकि, कोर्ट ने सावधानी बरतते हुए कहा कि यह शक्ति हर मामले में नहीं बल्कि सावधानी से इस्तेमाल की जाएगी।

यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि सुप्रीम कोर्ट बदलते सामाजिक परिदृश्य में न्याय की नई व्याख्या कर रहा है।

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