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सैलरी स्लिप दिखाओ, बोतल पाओ: सऊदी में अमीर गैर-मुस्लिमों को मिलेगी शराब!

सैलरी स्लिप दिखाओ, बोतल पाओ: सऊदी में अमीर गैर-मुस्लिमों को मिलेगी शराब!

रियाद: इस्लामिक दुनिया के सबसे सख्त शराब बैन वाले देश सऊदी अरब में एक बड़ा बदलाव आया है। यहां अब गैर-मुस्लिम विदेशी निवासियों को शराब खरीदने की इजाजत मिल गई है, लेकिन शर्त ये है कि उनकी मासिक सैलरी कम से कम 50,000 रियाल (करीब 11 लाख रुपये) होनी चाहिए। इसके लिए सैलरी स्लिप या प्रमाण-पत्र दिखाना अनिवार्य है। यह नियम देश की एकमात्र शराब दुकान पर लागू है, जो रियाद के डिप्लोमैटिक क्वार्टर में स्थित है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ‘विजन 2030’ के तहत आ रहा है, जो सऊदी को ग्लोबल बिजनेस हब बनाने पर जोर देता है।

पिछले साल जनवरी में खुली यह दुकान पहले सिर्फ विदेशी राजदूतों के लिए थी। बाद में प्रीमियम रेसिडेंसी वाले गैर-मुस्लिम निवासियों (जैसे बड़े निवेशक और उद्यमी) को भी एंट्री मिली। अब यह सुविधा हाई-इनकम वाले गैर-मुस्लिम एक्सपैट्रिएट्स तक बढ़ा दी गई है। दुकान में घुसने के लिए आईडी कार्ड के साथ सैलरी सर्टिफिकेट दिखाना पड़ता है। स्रोतों का कहना है कि यह बदलाव अनौपचारिक है – सरकार ने अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की। लेकिन ग्राहकों के इंटरव्यू से साफ है कि अमीर विदेशी अब आसानी से वाइन या बीयर खरीद सकते हैं।

सऊदी में शराब पर 70 साल पुराना बैन था, जो कुरान की शिक्षाओं से प्रेरित है। लेकिन हाल के वर्षों में महिलाओं को ड्राइविंग की इजाजत, सिनेमा हॉल खोलना और कंसर्ट्स जैसे बदलाव आ चुके हैं। यह नया नियम भी उसी दिशा में है – देश को आकर्षक बनाने के लिए। हालांकि, औसत सैलरी यहां करीब 10,000 रियाल (2.25 लाख रुपये) है, तो यह सुविधा सिर्फ ‘रिच एंड कनेक्टेड’ के लिए है। गरीब विदेशी मजदूरों को इससे दूर रखने का मकसद साफ दिखता है।

सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। एक यूजर ने लिखा, “सैलरी स्लिप के लिए बोतल? क्रेजी! अमीरों के लिए हिपोक्रिसी का नया स्तर।” दूसरे ने कहा, “यह गरीब वर्कर्स को पीने से रोकने का तरीका है, सिर्फ टूरिस्ट्स और अमीरों के लिए।” भारत जैसे देशों से सैकड़ों हजारों मजदूर सऊदी में काम करते हैं, जहां शराब की स्मगलिंग का काला बाजार फलता-फूलता था। अब यह नियम वैध रास्ता खोलेगा, लेकिन सिर्फ चुनिंदा लोगों के लिए। क्या यह सऊदी की आधुनिकता की दिशा में सही कदम है या धार्मिक मूल्यों से समझौता? बहस जारी है।

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