‘संचार साथी’ ऐप पर तकरार की पूरी कहानी: विपक्ष का हंगामा, सरकार की सफाई और ऐपल का इनकार
‘संचार साथी’ ऐप पर तकरार की पूरी कहानी: विपक्ष का हंगामा, सरकार की सफाई और ऐपल का इनकार
स्मार्टफोन्स में ‘संचार साथी’ ऐप को प्री-इंस्टॉल करने के दूरसंचार विभाग (DoT) के हालिया आदेश ने राजनीतिक और तकनीकी हलकों में भूचाल ला दिया है। विपक्ष ने इसे ‘जासूसी का हथियार’ बताकर सरकार पर हमला बोला, तो केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सफाई देते हुए कहा कि यह ऐप पूरी तरह वैकल्पिक है। वहीं, ऐपल जैसी कंपनी ने प्राइवेसी चिंताओं के चलते आदेश मानने से इनकार कर दिया है। आइए जानते हैं इस विवाद की पूरी समयरेखा।
क्या है ‘संचार साथी’ ऐप?
यह DoT का आधिकारिक ऐप है, जो नागरिकों को टेलीकॉम सेवाओं से जुड़ी सुविधाएं मुहैया कराता है। मुख्य फीचर्स में शामिल हैं:
चोरी या गुम हुए फोन को IMEI के जरिए ब्लॉक करना (CEIR सिस्टम)।
अपने नाम पर जारी सभी सिम कार्ड्स की जानकारी चेक करना।
फर्जी कॉल्स, स्पैम और संदिग्ध नंबर्स की रिपोर्टिंग।
डुप्लीकेट IMEI या फेक डिवाइस की जांच।
बैंक और जरूरी सेवाओं के वेरिफाइड हेल्पलाइन नंबर्स।
सरकार का दावा है कि यह ऐप साइबर फ्रॉड से बचाव के लिए लाया गया है। अब तक इससे 42 लाख से ज्यादा चोरी के फोन ब्लॉक हो चुके हैं, 26 लाख रिकवर हुए हैं और 2.89 करोड़ लोगों ने अपनी सिम्स वेरिफाई की हैं।
विपक्ष का हंगामा: ‘पेगासस प्लस प्लस’ का आरोप
1 दिसंबर को DoT ने सैमसंग, एप्पल, शाओमी जैसी कंपनियों को 90 दिनों के अंदर नए फोन्स में ऐप प्री-इंस्टॉल करने और पुराने डिवाइसेस के लिए OTA अपडेट जारी करने का निर्देश दिया। विपक्ष ने इसे गोपनीयता पर हमला बताया।
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने इसे ‘पेगासस प्लस प्लस’ कहा, आरोप लगाया कि ऐप कैमरा, लोकेशन, कॉल लॉग और SMS जैसी संवेदनशील परमिशन्स मांगता है।
महासचिव केसी वेणुगोपाल ने X पर लिखा, “बिग ब्रदर हमें नहीं देख सकता।” प्रियंका गांधी ने इसे संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया।
आम आदमी पार्टी (AAP) ने कहा कि ऐप के नोटिफिकेशन्स में डिलीट का ऑप्शन नहीं है।
संसद में हंगामा: लोकसभा-राज्यसभा में नारेबाजी से कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित। विपक्ष ने निर्देश वापस लेने की मांग की।
सोशल मीडिया पर #SancharSaathiApp ट्रेंड कर रहा है, जहां यूजर्स प्राइवेसी चिंताओं पर बहस कर रहे हैं।
सरकार की सफाई: ‘ऑप्शनल है, डिलीट कर दें’
विवाद बढ़ने पर मंत्री सिंधिया ने मंगलवार को स्पष्ट किया, “यह ऐप बाध्यकारी नहीं है। रखना चाहें तो रखें, डिलीट करना हो तो डिलीट कर दें। न रजिस्ट्रेशन करेंगे तो काम ही नहीं करेगा।” उन्होंने विपक्ष पर ‘भ्रम फैलाने’ का आरोप लगाया और कहा, “विपक्ष के पास मुद्दा न होने पर हम उनकी मदद नहीं कर सकते। हमारा फोकस उपभोक्ता सुरक्षा पर है।”
सरकार ने जोर देकर कहा कि ऐप से न जासूसी होती है, न कॉल मॉनिटरिंग। यह यूजर-इनिशिएटेड है और कोई पर्सनल डेटा एक्सेस नहीं करता। DoT ने पुराने फोन्स के लिए अपडेट को भी वैकल्पिक बताया।
ऐपल का इनकार: प्राइवेसी पॉलिसी का हवाला
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐपल ने प्री-इंस्टॉलेशन से इनकार कर दिया है। कंपनी का कहना है कि यह उनकी ग्लोबल प्राइवेसी पॉलिसी के खिलाफ है। ऐपल सरकार से चर्चा करना चाहती है, लेकिन आधिकारिक बयान नहीं दिया। अन्य कंपनियां जैसे सैमसंग भी कानूनी रास्ता अपनाने पर विचार कर रही हैं।
पिछले साल TRAI की इसी तरह की सिफारिश पर भी ऐपल ने विरोध किया था।
विवाद का असर और आगे क्या?
यह विवाद डिजिटल इंडिया की महत्वाकांक्षा और प्राइवेसी अधिकारों के बीच टकराव को उजागर करता है। टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्री-लोडेड ऐप्स यूजर चॉइस को सीमित करते हैं। सरकार ने निर्देश में बदलाव की कोई घोषणा नहीं की, लेकिन विपक्ष की मांग पर संसदीय चर्चा हो सकती है।
क्या यह ऐप वाकई सुरक्षा का हथियार बनेगा या निगरानी का? जवाब आने वाले दिनों में। अधिक अपडेट्स के लिए न्यूज चैनल्स फॉलो करें।
