उत्तराखंड

उत्तराखंड खनन नीति पर हाईकोर्ट का नोटिस: जनहित याचिका में 18 सितंबर 2024 नोटिफिकेशन को दी चुनौती, 8 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का आदेश

उत्तराखंड खनन नीति पर हाईकोर्ट का नोटिस: जनहित याचिका में 18 सितंबर 2024 नोटिफिकेशन को दी चुनौती, 8 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का आदेश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की नई खनन नीति को लेकर एक जनहित याचिका (PIL) पर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार, खनन विभाग के सचिव, उत्तराखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) और उधम सिंह नगर के जिलाधिकारी (DM) को नोटिस जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस सुभाष कुमार उपाध्याय की खंडपीठ ने सभी पक्षकारों को 8 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का समय दिया है। यह फैसला 25 नवंबर को हुई सुनवाई के बाद आया, जिसमें याचिकाकर्ता ने 18 सितंबर 2024 के नोटिफिकेशन को खारिज करने की मांग की है।

यह मामला उत्तराखंड में अवैध खनन, पर्यावरण क्षति और राजस्व हानि से जुड़ा है, जो राज्य में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। हाईकोर्ट के इस कदम से खनन विभाग पर दबाव बढ़ गया है, और विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नीति में सुधार की गुंजाइश बनेगी।

याचिका का बैकग्राउंड: बाजपुर निवासी रमेश लाल की PIL

याचिका बाजपुर (उधम सिंह नगर) के निवासी रमेश लाल ने दायर की है। उन्होंने खनन नीति के तहत जारी 18 सितंबर 2024 के नोटिफिकेशन को चुनौती दी है, जिसमें खनन स्टॉकिंग (भंडारण) की अनुमति देने की प्रक्रिया को लेकर कई खामियां बताई गई हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह नीति अवैध खनन को बढ़ावा दे रही है, पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है और राज्य के राजस्व को चोट पहुंचा रही है।

रमेश लाल ने याचिका में कहा है कि नीति पर्यावरण संरक्षण कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करती है। उन्होंने मांग की है कि नोटिफिकेशन को तत्काल निरस्त किया जाए और खनन स्टॉक की स्वतंत्र जांच कराई जाए। यह PIL खनन विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाती है, जो उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में खनन गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है।

याचिका में उठाई गई मुख्य खामियां

याचिकाकर्ता ने नीति की कई कमियों पर सवाल खड़े किए हैं, जो निम्नलिखित हैं:

डीएम को अधिकृत करना गलत: खनन भंडारण की अनुमति के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM) को अधिकृत किया गया है, जबकि यह जिम्मेदारी खनन अधिकारी या तहसीलदार की होनी चाहिए। इससे प्रशासनिक दुरुपयोग की आशंका है।

प्रदूषण बोर्ड को कमेटी से बाहर करना: खनन स्टॉकिंग की मंजूरी देने वाली कमेटी में खनन अधिकारी और तहसीलदार को शामिल किया गया है, लेकिन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बाहर रखा गया है। यह पर्यावरणीय मूल्यांकन की अनदेखी करता है।

खेती वाली भूमि पर स्टॉकिंग: कृषि भूमि पर खनन स्टॉक की अनुमति दी गई है, जिससे मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो रही है। इससे अवैध खनन बढ़ रहा है और किसानों को नुकसान हो रहा है।

दूरी के मानक असंगत: धार्मिक स्थलों और आवासीय क्षेत्रों से खनन स्टॉक की न्यूनतम दूरी 5 मीटर रखी गई है, जबकि वन क्षेत्रों से 10 मीटर। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह पर्यावरण और सुरक्षा के लिए अपर्याप्त है, खासकर गंगा और अन्य नदियों के किनारे।

राजस्व हानि: नीति के कारण अवैध खनन बढ़ा है, जिससे राज्य को करोड़ों का नुकसान हो रहा है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2017 के आदेशों का हवाला दिया गया है, जो खनन पर सख्ती का प्रावधान करते हैं।

ये खामियां न केवल नीति की वैधानिकता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि उत्तराखंड के नदी-घाटी क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षति को भी उजागर करती हैं।

हाईकोर्ट का आदेश: नोटिस और समयसीमा

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने याचिका के तर्कों को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने राज्य सरकार, खनन विभाग के सचिव, UKPCB और उधम सिंह नगर DM को नोटिस जारी कर 8 दिसंबर तक काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस दौरान कोई नया नोटिफिकेशन जारी न किया जाए, जब तक मामले की अगली सुनवाई न हो।

यह आदेश PIL के तहत पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देता है। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र ने कहा, “खनन नीति का कार्यान्वयन पारदर्शी और कानूनी होना चाहिए। सभी पक्षों के जवाब के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।”

उत्तराखंड में खनन का विवादित इतिहास

उत्तराखंड में खनन का मुद्दा लंबे समय से विवादास्पद रहा है। राज्य की नदियां—जैसे गंगा, कोसी और गौला—खनन का केंद्र हैं, लेकिन इससे बाढ़, भूस्खलन और प्रदूषण बढ़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में खनन पर चार महीने का बैन लगाया था, और 2022 में हाईकोर्ट ने नई खनन नियमों पर स्टे दिया था। हाल ही में, 2024 में निजी भूमि पर ‘चुगान’ (खनन) की अनुमति पर नीति रद्द की गई थी, जिसके खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है।

2024 की नई नीति को भी पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के बिना लागू करने का आरोप है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह PIL खनन को नियंत्रित करने का एक और मौका है, खासकर जब राज्य में 12 जिलों में नदी-घाटी खनन चल रहा है।

आगे क्या? पर्यावरण और राजस्व पर असर

8 दिसंबर की सुनवाई निर्णायक होगी। यदि कोर्ट नोटिफिकेशन रद्द करता है, तो खनन गतिविधियां प्रभावित होंगी, जिससे ठेकेदारों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। लेकिन पर्यावरणविद इसे सकारात्मक मान रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अनिल जोशी ने कहा, “यह फैसला नदियों की रक्षा करेगा और अवैध खनन पर अंकुश लगाएगा।”

राज्य सरकार ने अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया, लेकिन खनन विभाग स्रोतों का कहना है कि वे कोर्ट में मजबूत पक्ष रखेंगे। यह मामला उत्तराखंड की सतत विकास नीति को परखेगा। अधिक अपडेट्स के लिए हाईकोर्ट की वेबसाइट चेक करें।

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