उत्तराखंड

उत्तराखंड के 25 साल: कंडी मार्ग अब भी अधूरा सपना, सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश ने जगाई उम्मीद!

उत्तराखंड के 25 साल: कंडी मार्ग अब भी अधूरा सपना, सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश ने जगाई उम्मीद!

उत्तराखंड राज्य गठन को पूरे 25 साल (9 नवंबर 2000 – 9 नवंबर 2025) हो गए, लेकिन राज्य की सबसे ऐतिहासिक और रणनीतिक सड़क – कंडी मार्ग – आज भी कागजों में ही कैद है। ब्रह्मदेव मंडी (टनकपुर) से कोटद्वार तक करीब 400 किमी लंबा यह मार्ग कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों को सीधे जोड़ने वाला सबसे छोटा रास्ता है। अगर बन जाता, तो हल्द्वानी से देहरादून की दूरी 450 किमी से घटकर सिर्फ 250-280 किमी रह जाती। लेकिन 200 साल पुरानी इस सड़क को फिर से जीवित करने का सपना अब तक अधूरा है। अब सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के आदेश ने नई किरण जगाई है – कोर्ट ने केंद्र और उत्तराखंड सरकार को 3 महीने में स्टेटस रिपोर्ट देने को कहा है।

कंडी मार्ग क्यों इतना खास?

ऐतिहासिक महत्व: ब्रिटिश काल में इसे सब-माउंटेन रोड कहा जाता था। यही वह लाइन थी जिसके ऊपर तैनात कर्मचारियों को “पर्वतीय भत्ता” मिलता था, नीचे मैदानी भत्ता। यानी यह पहाड़ और मैदान की सीमा हुआ करती थी।

रणनीतिक महत्व: भारत-नेपाल सीमा से सटा यह मार्ग रक्षा दृष्टि से भी अहम है। आपातकाल में यह कुमाऊं-गढ़वाल को तेजी से जोड़ सकता है।

आर्थिक महत्व: टनकपुर → चम्पावत → लोहाघाट → पिथौरागढ़ → बागेश्वर → कर्णप्रयाग → श्रीनगर → कोटद्वार। इससे सीमांचल के बाजार, पर्यटन और व्यापार को बूस्ट मिलेगा।

दूरी में कटौती: अभी हल्द्वानी से देहरादून जाने के लिए रामनगर-काशीपुर-नजीबाबाद का 450+ किमी का चक्कर लगाना पड़ता है। कंडी मार्ग बनने से 170-200 किमी बचेंगे, समय 8-10 घंटे से घटकर 5-6 घंटे।

25 साल में क्या हुआ? सिर्फ वादे, कोई काम नहीं

राज्य गठन से पहले: 1994 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे रिन्यू करने का प्रस्ताव बनाया था।

राज्य गठन के बाद:

कांग्रेस (एनडी तिवारी, हरीश रावत) → हर चुनाव में वादा।

बीजेपी (भुवन चंद्र खंडूरी, रमेश पोखरियाल, त्रिवेंद्र, धामी) → हर बार घोषणा, हर बार भूल गए।

2018 में त्रिवेंद्र सरकार ने DPR बनवाई, 2021 में धामी ने शिलान्यास का नाटक किया – बस फाइलें घूमती रहीं।

बाधाएं:

वन भूमि (200+ किमी जंगल से गुजरता है)।

पर्यावरण मंजूरी (सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी की रोक)।

बजट की कमी (अनुमानित लागत 8,000-10,000 करोड़)।

राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव।

सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश: आखिरी उम्मीद

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की ग्रीन बेंच (जस्टिस भूषण गवई और जस्टिस संदीप मेहता) ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र और उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा:

“राज्य गठन के 25 साल बाद भी यह महत्वपूर्ण मार्ग नहीं बना, यह चिंता की बात है।”

“राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और जनहित में यह जरूरी है।”

केंद्र और राज्य सरकार को 3 महीने में स्टेटस रिपोर्ट देने को कहा। अगली सुनवाई फरवरी 2026 में।

जनता की आवाज

पहाड़ के लोग कहते हैं – “हर चुनाव में कंडी मार्ग का नाम लेते हैं, वोट लेते हैं, फिर भूल जाते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ही हमारी आखिरी उम्मीद है।”

अब देखना यह है कि 25 साल की उपेक्षा के बाद क्या यह ऐतिहासिक सड़क वाकई बन पाएगी या फिर फाइलों में ही दम तोड़ देगी। उत्तराखंड की जनता की नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है।

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